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Editorial

यह खिलौना खतरनाक है

यह खिलौना खतरनाक है
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Naresh Kumar

May 27, 2026

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हर हाथ में एक खिलौना है।क्या बुजुर्ग,क्या अधेड़,क्या युवा, क्या महिला,क्या नवयौवना,क्या बच्चे,क्या छात्र और तो और बिल्कुल छोटे बच्चे जिनकी उम्र लगभग एक वर्ष से ऊपर है,उनके हाथों में भी हमने खिलौना पकड़ा दिया है और खुद भी तो वही खिलौना पकड़ा हुआ है और शिक्षा ग्रहण करने वाले हर छात्र के हाथ में यह खिलौना आपको मिलेगा?
हर हाथ में एक खिलौना है।क्या बुजुर्ग,क्या अधेड़,क्या युवा, क्या महिला,क्या नवयौवना,क्या बच्चे,क्या छात्र और तो और बिल्कुल छोटे बच्चे जिनकी उम्र लगभग एक वर्ष से ऊपर है,उनके हाथों में भी हमने खिलौना पकड़ा दिया है और खुद भी तो वही खिलौना पकड़ा हुआ है और शिक्षा ग्रहण करने वाले हर छात्र के हाथ में यह खिलौना आपको मिलेगा?चौंक गए साहब कि आखिर ऐसा कौनसा खिलौना है,जी यह खिलौना है मोबाइल खिलौना,जो आजकल हर हाथ की शान है,हर छोटे-बड़े की जान है,सबका प्राण है,सबकी पहली और सख्त जरूरत है।यकीन मानिए यह एक ऐसा खिलौना है कि एटम बम का इलाज ढूंढा जा सकता है मगर मोबाइल की लत का कोई इलाज नहीं है और ये लत ऐसी है कि यदि आप यात्रा कर रहे हैं,किसी पारिवारिक कार्यक्रम में हैं,कक्षा में हैं,यहाँ तक कि किसी शोक सभा में हैं,तब भी मोबाइल में घुसे पड़े हैं।दो जिगरी दोस्त हों,साथ हों मगर आपस में बात नहीं करेंगे,जो कुछ भी करेंगे मोबाइल के माध्यम से करेंगे।परिवार के सदस्य आपस में बैठे हैं मगर हर एक अपने-अपने खिलौने से खेल रहे हैं।रील्ज ने तो कमाल ही कर रखा है,हर कोई लगा हुआ है,लाइक,सब्सक्राइबर बढ़ाने में,अंधी दौड़ है और सभी दौड़ रहे हैं,छोटे बच्चे भी इसमें शामिल हैं।कई बार तो इस आभासी दुनिया में ऐसी सामग्री परोसी जाती है कि बस पूछिए मत।यह सामग्री आज के युवा को,आज के छात्र वर्ग की मानसिकता को कहीं और सेट कर रही है।जहाँ तक छात्रों का सवाल है तो,उनकी हर समस्या का हल केवल मोबाइल पर ही होता है,मास्टर जी को तो बस वे देखने जाते हैं या फिर अपना चेहरा दिखाने जाते हैं कि हम भी हैं इस दुनिया में।कमाल है किसी को पहाड़े आते हों,पता नहीं क्या हो गया है?किताबें किसी के पास नहीं मिलेगी और मिलेगी तो सिर्फ परीक्षाओं के दौरान नकल की पर्ची बनाने के लिए,फाड़ने के लिए।आँखे अंदर धँसी हुई हैं,गाल पिचके हुए हैं,चक्कर आते हैं मगर मोबाइल देखना बन्द नहीं होगा।कहीं ऐसा ना हो कि कल को डॉक्टर ये लिखे कि हफ्ते में मोबाइल एक घन्टे देखिए, देखना होगा और ऐसा सुनकर ही किसी को दिल का दौरा पड़े और राम नाम सत्य हो जाए।यकीन करिए वह दिन बहुत दूर नहीं है क्योंकि आज भी जब कुछ ही देर के लिए यदि मोबाइल इधर से उधर ही जाए,तो ऐसे लगता है कि जैसे जान ही निकल गई।हैरत की बात है कि जो चीज हमारे लिए बनी थी,पता नहीं धीरे-धीरे हम ही उस चीज के लिए हैं यानि हम मोबाइल के गुलाम बन गए।ऐसे गुलाम कि आजादी का कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है।इतनी दूर निकल आए हैं हम कि वापिस लौटना मुश्किल है।बेशक आज हम खुश हों कि हम छोटे से लेकर बड़े तक टेक्नोलॉजी से जुड़े हैं और दुनिया के साथ कदम ताल कर रहे हैं।यकीन मानिए हम गलत सोच रहे हैं क्योंकि इस खिलौने ने हमें पंगु बना दिया है।संवेदनहीन बना दिया है।हमें निर्भर बना दिया है।यकीनन इससे बाहर निकलना होगा,इससे पार पाना होगा और अभी पाना होगा वरना हम सब कुछ खो देंगे।बहुत कुछ तो हम अभी भी खो चुके हैं।याद रखिए मोबाइल हमारे लिए है,हम इसके लिए नहीं और कोशिश करें खुद को भी बचाएं और अपने-अपने बच्चों को भी क्योंकि अभी समय है।
 
कृष्ण कुमार निर्माण एक स्वतंत्र लेखक हैं।

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