जिसमें डिमांड नहीं, वही डायमंड है: निष्काम भाव ही जीवन की असली अमीरी
Naresh Kumar
Sep 07, 2026
इंसान की असली अमीरी धन से नहीं, उसके विचार और स्वभाव से तय होती है। सुदामा का निष्काम भाव बताता है कि जब मनुष्य पाने की इच्छा छोड़कर पूर्ण समर्पण करता है, तब ईश्वर स्वयं उसके जीवन को अनमोल बना देते हैं।

अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि फलां व्यक्ति से थोड़ा संभलकर रहना क्योंकि वह बहुत गरीब है,कभी भी आपकी परेशान कर सकता है।यहाँ साफ मतलब यही है कि फलां व्यक्ति आर्थिक तौर पर कमजोर है,इसलिए वह गरीब कहा गया और इसलिए उससे संभलने की सलाह दी गई।
दूसरी तरफ अक्सर लोग उनसे दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं,जो अमीर हैं क्योंकि वक्त आने पर वो उनके काम आएंगे।यह सही है कि पैसा बहुत जरूरी से भी जरूरी चीज है लेकिन इतना भी जरूरी नहीं है कि हम अपनी हर बात,संस्कार उस पर अर्पित कर दें।
असल बात तो यह है कि आदमी के विचार ही हैं जो किसी को अमीर या गरीब बनाते हैं क्योंकि अक्सर हमें सुनने को मिलता है कि फलां आदमी अमीर बहुत है मगर उसके पास जिगर नहीं है और वह बहुत कंजूस है और फलां आदमी गरीब बेशक है मगर गजब का जिगरा रखता है और दिल खोलकर खर्च करता है क्योंकि यहाँ विचार हावी है।इसी प्रकार जिंदगी में निष्काम भाव से जीने का मजा ही अलग है।
क्योंकि जब तक व्यक्ति के भीतर पाने की इच्छा शेष है,तब तक उसे गरीब ही समझना चाहिए।सुदामा जी को गले लगाने के लिए आतुर द्वारिकाधीश इसलिए भागकर नहीं गए कि सुदामा के पास कुछ नहीं है अपितु इसलिए गए कि सुदामा के मन में कुछ भी पाने की इच्छा अब शेष नहीं रह गयी थी।
इसलिए ही संतों ने कहा है कि जो कुछ नहीं माँगता उसको भगवान स्वयं अपने आप को दे देते हैं। द्वारिकापुरी में आज सुदामा राजसिंहासन पर विराजमान हैं और कृष्ण समेत समस्त पटरानियाँ चरणों में बैठकर उनकी चरण सेवा कर रही हैं। सुदामा अपने प्रभाव के कारण नहीं पूजे जा रहे हैं अपितु अपने स्वभाव और कुछ भी न चाहने के भाव के कारण पूजे जा रहे हैं।सुदामा की कुछ भी न पाने की इच्छा ने ही उन्हें द्वारिकापुरी के सदृश भोग ऐश्वर्य प्रदान कर दिया। मानो कि भगवान ये कहना चाह रहे हों कि जिसकी अब और कोई इच्छा बाकी नहीं रही वो मेरे ही समान मेरे बराबर में बैठने का अधिकारी बन जाता है।
मनुष्य का निष्काम भाव अथवा कामना शून्यता ही उसे अबसे अधिक मूल्यवान,अनमोल और उस प्रभु का प्रिय बना देती है।जिसके जीवन में कामना नहीं होती उसे दु:खों का सामना भी नहीं करना पड़ता है।जिसमें डिमांड नहीं होती वो ही डायमंड होता है।
क्योंकि किसी ने लिखा भी है कि बिन मांगे मोती मिले,मांगे मिले ना भीख क्योंकि यदि पूर्ण समर्पण है और वह भी निष्काम भाव से,तो फिर उसे सब कुछ ईश्वर खुद ही देता है।तभी तो कहा भी गया है कि बिन मांगे मोती मिले,मांगे मिले ना भीख।