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Editorial

टीचर ट्रांसफर से ‘नाराज फूफा’ और Gen-Z तक, सवाल कई!

टीचर ट्रांसफर से ‘नाराज फूफा’ और Gen-Z तक, सवाल कई!
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Naresh Kumar

Sep 09, 2026

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टीचर ट्रांसफर, अफसरशाही पर अदालत की टिप्पणी, ‘नाराज फूफा’ की चर्चा और Gen-Z से संवाद—संपादकीय में मौजूदा मुद्दों पर व्यंग्यात्मक नजर।

टीचर ट्रांसफर, अफसरशाही पर अदालत की टिप्पणी, ‘नाराज फूफा’ की चर्चा और Gen-Z से संवाद—संपादकीय में मौजूदा मुद्दों पर व्यंग्यात्मक नजर।

काफी फजीहत के बाद आखिरकार फिर से टीचर ट्रांसफर शेड्यूल आ ही गया।वैसे आया तो इन्हीं दिनों पिछले साल भी था पर आकर वापिस चला गया था,कोर्ट का ऐसा हथौड़ा चला था कि आगे बढ़ ही नहीं पाया पर अब चार साल में चौथी बार आया,देखने वाली बात यह होगी कि टीचर ट्रांसफर का शेड्यूल अबकी बार कौन-सा गुल खिलाता है

यानि कि ट्रांसफर करवाकर नए स्कूलों में जॉइन करवाता है या फिर पहले की तरह एक बार फिर से शिक्षा विभाग और प्रदेश सरकार की फजीहत करवाता है पर यकीन मानिए यदि अबकी बार फजीहत हुई तो यह दुनिया का आठवाँ अजूबा होगा क्योंकि सात तो पहले से ही मौजूद बताते है।

वैसे अबकी बार शिक्षा पूरा मुस्तैद तो दिखाई देता है मगर चूँकि दूध का जला छाछ को भी फूँक मारकर पिया करता है,वही हालत गुरु जी की हो रही है पर देखने वाली बात यह होगी कि अबकी बार टीचर ट्रांसफर सिरे चढ़ पाएगी या फिर से फजीहत कराकर वापिस मुड़ जाएगी।खैर,यह तो आने वाला समय बताएगा पर सबकी नजर इस पर जरूर होंगी।


याद कीजिए नोएडा का इसी साल हुआ मजदूर आंदोलन,जिसने काफी सुर्खियाँ तो बटोरी ही थी,साथ ही आगजनी और छिटपुट हिंसा भी हुई थी,इसी आंदोलन के दौरान एक चौबीस वर्षीय युवती आकृति को भी पुलिस ने अरेस्ट किया था और बहुत सारे आरोप लगाकर एनएसए लगाकर जेल भेज दिया था पर इसी संदर्भ में जो फैसला इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुनाया है,वह यह पोल खोलता है कि अफसरशाही राजनीतिक दबाब में न केवल काम करती है बल्कि मानवीय अधिकारों का शोषण भी करती है।कोर्ट ने जो टिप्पणी की है,वह काफी सख्त है और उस टिप्पणी को नोएडा की डीएम,पुलिस की ए सी आर में भी दर्ज करने को कहा है और आकृति को रिहा किया गया है।गजब है कि अफ़सरशाही में बैठे लोग क्योंकर ऐसा करते हैं

जबकि ये सब जनता के लिए होते हैं पर ये खुद सत्ता में बैठे नेताओं की उंगलियों पर नाचते हैं और बाकी सब कुछ भूल जाते हैं।ऐसे कई केस हैं,जैसे आकृति का केस है पर कौन सुनता है साहब?खैर, अब देखने वाली बात यह होगी कि कोर्ट की उक्त सख्त टिप्पणी के बाद क्या अफ़सरशाही के रुख में कोई परिवर्तन आता है या नहीं मगर लगता नहीं कि कोई परिवर्तन आएगा क्योंकि जब भी कोई अफसर,नेता और पुलिस या कोई दबंग खुद को खुदा समझने लग जाए तो परिवर्तन की उम्मीद कम ही हुआ करती है।फिर भी उम्मीद तो की जानी चाहिए कि परिवर्तन आएगा।


नाराज फूफा वाला मुहावरा आजकल पूरी सुर्खियाँ बटोर रहा है और केंद्रबिंदु में है।इस स्तिथि को देखकर दूसरे जितने भी मुहावरे हैं,उनको नाराज फूफा वाले मुहावरे से चिढ़ होने लगी है कि आखिर इस मुहावरे में ऐसा क्या है?तो बाकी के बचे मुहावरों को बताते चले कि पहला अंतर तो यही है कि यह मुहावरा साहेब की जुबान से दो बार निकल चुका है और जो मुहावरा साहेब की जुबान से निकल जाए फिर वह सुर्खियाँ न बटोरे,ऐसा कैसे हो सकता है?

तो जनाब आजकल टीवी वाले इसी मुहावरे पर दिन रात बहस कर रहे हैं,ऐसा लगता है कि शायद बहस के लिए और कोई मुद्दा इस देश में बचा ही नहीं है।वैसे जिस संदर्भ में यह नाराज फूफा वाला मुहावरा फट रहा है,वह तो साहेब की भी पोल खोल रहा है क्योंकि जिस संदर्भ में नाराज फूफा वाले मुहावरे का अर्थ निकाला जा रहा है,उससे तो ऐसा ही लगता है कि जहाँ इनकी सरकार नहीं हैं,वहाँ दूसरे नाराज फूफा हैं और जहाँ उनकी सरकार है,वहाँ दूसरे वाले नाराज फूफा हैं यानि कि नाराज फूफा सिर्फ एक मुहावरा है पर यह सब पर ही लागू होता है।खैर,देखने वाली बात होगी कि नाराज फूफा वाला मुहावरा क्या गुल खिलाता है?


अच्छा!एक बात और कि छात्रों यानि जेन-जी को हर कोई लुभाने पर लगा हो,ऐसा लगता है कि छात्र न होकर महबूबा हो गए हैं,हर कोई उनसे संवाद कर रहा हैं पर इस सारे प्रकरण में तो संवाद शब्द का अर्थ और परिभाषाएं एक साथ ही बदलती दिखाई दे रहे हैं।

क्या आपको इस बारे कुछ पता चला,अगर पता चले तो जरूर बताना कि आखिर संवाद का सही अर्थ और परिभाषा क्या होती है,क्योंकि आजकल यह शब्द कुछ ज्यादा ही टीआरपी बटोर रहा है?खैर,देखने वाली बात यह होगी कि आने वाले समय में ये जेन-जी,जिन्हें लुभाने/पटाने के लिए हर कोई हरसंभव प्रयास कर रहा है,क्या गुल खिलाएगा क्योंकि यह जेन-जी है,इसका किसी को कुछ भी पता नहीं है?

 
 
 

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