सत्संग से जीवन बदलता है, अंगारे की सीख समझिए आज
Naresh Kumar
Sep 10, 2026
सत्संग से दूर होने पर जीवन में क्या फर्क पड़ता है, बुझते अंगारे की कहानी और ईश्वर भक्ति की सीख इसे समझाती है।

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किसी ने ठीक ही कहा है कि संगति से ही रंगत चढ़ती है और सत्संगति से विवेक प्राप्त होता है।यदि कोई नियमित रूप से सत्संग में आ रहा है तो उस पर कुछ न कुछ असर तो होगा ही।और यदि वही निरंतरता संगति में रहने की टूट जाए,तो निश्चित रूप से फर्क पड़ेगा।ठीक ऐसे ही सत्संगति छूट जाए तो भी फर्क पड़ना निश्चित है।अब देखिए नियमित रूप से सत्संग में आने वाले एक व्यक्ति ने सत्संग मे आना अचानक बंद कर दिया।
जब कुछ दिन बीत गए तो साथ के एक सत्संग करने वाले अनुभवी संत ने उसके घर जाने की सोची।जिस दिन वह अनुभवी उसके घर गया,उस शाम बहुत सर्दी थी।अनुभवी संत को वह व्यक्ति दहकती अँगीठी के सामने बैठा मिला,वह घर में अकेला था।उसने अनुभवी संत का स्वागत किया,अँगीठी के सामने रखी एक बड़ी-सी कुर्सी पर बैठने का आग्रह किया और उसके कुछ बोलने की प्रतीक्षा करने लगा।
अनुभवी संत कुर्सी पर आराम से बैठ तो गया पर बोला कुछ नहीं।कुछ देर बाद अनुभवी संत ने चिमटा उठाया और बड़ी सावधानी से एक बड़ा सा दहकता-चमकता अंगारा अँगीठी में से निकाला और उसे एक तरफ रख दिया। इसके बाद वह फिर कुर्सी पर आराम से बैठ गया,लेकिन बोला कुछ नहीं।
वह अनुभवी संत यह सब बस देखता रहा।उस अकेले अंगारे की चमक-दमक धीरे-धीरे कम होती चली गई और जल्दी ही वह बुझा-बुझा और ठंडा सा हो गया।अनुभवी संत के आने के बाद से अभिवादन के अलावा किसी ने भी एक शब्द तक नहीं बोला था।अनुभवी संत ने चलने से पहले वह ठंडा और बुझा-बुझा कोयला उठाया और वापस आग में फेंक दिया,जिससे वह तुरंत ही आस-पास के जलते कोयलों के कारण रोशनी और गर्मी से फिर चमकने-दहकने लगा।
अनुभवी संत चलने के लिए जैसे ही उठा तो वह मेज़बान व्यक्ति बोला कि आपके आने का बहुत-बहुत धन्यवाद संत जी और विशेष रूप से इस अंगारे वाले उपदेश के लिए।मैं अब आगे से हर सत्संग में आया करूँगा,कभी नागा नहीं करूगा।सत्संग परिवार से सदैव जुड़ा रहूँगा।यकीन मानिए मनुष्य जीवन का सार ईश्वर भक्ति है और भक्ति का मूल आधार सत्संग है।
सत्संग सर्वोच्च चेतना प्रदान करता है।सत्संग जीवन को देखने का सही दृष्टिकोण प्रदान करता है।सत्संग ही मानव जीवन को सर्वोत्तम सदगति प्रदान करता है।सत्संग का अभाव मतलब मोह और भ्रम का विस्तार है।सच मानिए आज आदमी अपने दुःख से कम दुःखी और दूसरों के सुख से ज्यादा दुःखी है।आज आदमी इसलिए दु:खी नहीं कि उसके पास कम है,अपितु इसलिए दु:खी है कि दूसरे के पास अधिक है।
हमारे शास्त्रों ने इसे मच्छर की तरह खून चूसने वाला भाव बताया है।दूसरों को देखकर जीना खुद को दुखाकर जीने जैसा है।किसी की खुशी को देखकर जलना उस मशाल की तरह जलना है,जिसे दूसरों को खाक करने से पहले स्वयं को राख करना पड़ता है।आपके पास जो है वह निसंदेह काफी है।जो है उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दो,जो नहीं मिला उसके लिए किसी को दोष देने की बजाय अपनी योग्यता को बढाओ,जीवन स्वतः सुखमय बन जायेगा।
क्योंकि सबको सब कुछ नहीं मिलता लेकिन जिसकी भी जो जरूरत है,उस जरूरत से भी ईश्वर किसी को खाली नहीं रखता।इसलिए हमेशा अच्छी संगति में रहिए और निरन्तर सत्संग करते रहिए ताकि भीतरी और बाहरी विस्तार हो सके।