ढोल की पोल खुली: शोर ज्यादा, सच्चाई कुछ नहीं!
Naresh Kumar
Oct 16, 2026
संपादकीय: ढोल की पोल खुली, जब सच सामने आया

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22 hours ago
अक्सर आपने यह मुहावरा सुना होगा कि ‘ढोल की पोल खुल गई।’ इसका अर्थ है कि बड़ी-बड़ी बातें करने वाले व्यक्ति की असलियत समय आने पर सामने आ जाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर यह मुहावरा कैसे बना? एक छोटी-सी रोचक और शिक्षाप्रद कहानी हमें बताती है कि कैसे एक ढोल की पोल खुली और किस तरह बाहरी दिखावे का सच सामने आया।
एक बार एक जंगल के निकट दो राजाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। युद्ध में एक राजा विजयी हुआ, जबकि दूसरे को हार का सामना करना पड़ा। युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों राजाओं की सेनाएं अपने-अपने नगरों को लौट गईं। लेकिन सेना का एक बड़ा ढोल युद्धस्थल के पास ही छूट गया। इस ढोल को बजाकर सेना के साथ चलने वाले भांड और चारण रात के समय वीरता की कहानियां सुनाया करते थे।
कुछ दिनों बाद उस क्षेत्र में तेज आंधी आई। आंधी के कारण ढोल लुढ़कता हुआ एक सूखे पेड़ के पास जाकर रुक गया। पेड़ की सूखी टहनियां ढोल से इस तरह सट गई थीं कि जब भी तेज हवा चलती, वे ढोल से टकरातीं और ‘ढमाढम-ढमाढम’ की जोरदार आवाज पूरे जंगल में गूंजने लगती।
उसी जंगल में एक सियार रहता था। एक दिन उसने ढोल की आवाज सुनी तो वह बुरी तरह डर गया। उसने पहले कभी किसी जानवर की ऐसी विचित्र और तेज आवाज नहीं सुनी थी। वह सोचने लगा कि आखिर यह कौन-सा जीव है, जो इतनी जोरदार आवाज निकालता है? क्या यह कोई विशाल और खतरनाक जानवर है?
सियार ने उस रहस्यमयी जीव के बारे में जानने का निश्चय किया। वह झाड़ियों के पीछे छिपकर ढोल पर नजर रखने लगा। वह समझना चाहता था कि यह जीव उड़ सकता है या चार पैरों पर दौड़ता है। लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था।
एक दिन सियार झाड़ी के पीछे छिपा हुआ था। तभी पेड़ से उतरकर एक गिलहरी ढोल पर कूद गई। उसके कूदते ही ढोल से हल्की-सी आवाज निकली। गिलहरी आराम से ढोल पर बैठकर दाना कुतरने लगी। यह देखकर सियार का डर कुछ कम हुआ। उसने सोचा कि यदि यह कोई हिंसक जीव होता, तो गिलहरी इसके ऊपर इतनी निश्चिंत होकर कैसे बैठ सकती थी?
अब सियार धीरे-धीरे ढोल के पास पहुंचा। उसने उसे सूंघा और चारों ओर घूमकर देखा। उसे न तो उसका सिर दिखाई दिया और न ही पैर। तभी अचानक हवा का तेज झोंका आया और पेड़ की सूखी टहनियां ढोल से टकरा गईं। जोरदार ‘ढम’ की आवाज सुनकर सियार घबराकर पीछे उछल पड़ा।
कुछ देर बाद उसने स्वयं को संभाला और सोचने लगा कि यह तो किसी जीव का बाहरी खोल है। असली जानवर इसके भीतर छिपा हुआ होगा। वह अनुमान लगाने लगा कि जिस जीव की आवाज इतनी भारी और जोरदार है, उसका शरीर भी निश्चित रूप से बहुत मोटा-ताजा होगा।
यह सोचकर सियार खुशी-खुशी अपनी मांद में पहुंचा और सियारी से बोला, "दावत के लिए तैयार हो जाओ। आज मैंने एक बहुत मोटे-ताजे शिकार का पता लगाया है।"
सियारी ने उत्सुकता से पूछा, "तो फिर तुम उसे मारकर साथ क्यों नहीं लाए?"
सियार ने उसे झिड़कते हुए कहा, "मैं तुम्हारी तरह मूर्ख नहीं हूं। वह जीव एक मजबूत खोल के भीतर छिपा हुआ है। उस खोल के दोनों ओर सूखी चमड़ी के दरवाजे हैं। यदि मैं एक तरफ से उसे पकड़ने की कोशिश करता, तो वह दूसरी तरफ से भाग जाता। इसलिए हमें दोनों ओर से एक साथ उसे पकड़ना होगा।"
रात को चांद निकलने के बाद सियार और सियारी शिकार की तलाश में निकल पड़े। जैसे ही वे ढोल के पास पहुंचे, हवा के झोंके से टहनियां फिर ढोल से टकराईं और ‘ढम-ढम’ की आवाज गूंज उठी।
सियार ने सियारी के कान में कहा, "सुनी तुमने इसकी आवाज? जरा सोचो, जिसकी आवाज इतनी भारी है, वह खुद कितना मोटा-ताजा होगा। आज तो हमें भरपेट भोजन मिलेगा।"
दोनों ने मिलकर ढोल को सीधा किया और उसके दोनों ओर बैठ गए। इसके बाद वे अपने दांतों से ढोल के दोनों चमड़े वाले हिस्सों को फाड़ने लगे। काफी मेहनत के बाद जब चमड़े के हिस्से कटने लगे, तो सियार ने सियारी को सावधान करते हुए कहा, "होशियार रहना। जैसे ही रास्ता खुले, हम दोनों एक साथ अपने पंजे अंदर डालकर शिकार को दबोच लेंगे।"
दोनों ने एक साथ ढोल के भीतर पंजे डाले और अंदर छिपे जीव को तलाशने लगे। लेकिन ढोल के भीतर कोई जानवर था ही नहीं। अंदर टटोलते हुए दोनों के हाथ एक-दूसरे से टकरा गए।
दोनों हैरान रह गए और एक साथ चिल्लाए, "अरे! यहां तो कुछ भी नहीं है!"
जिस ढोल की आवाज सुनकर सियार ने एक विशाल और मोटे-ताजे जानवर की कल्पना कर ली थी, वह वास्तव में अंदर से पूरी तरह खोखला निकला। दोनों अपनी मूर्खता पर पछताने लगे और माथा पीटकर रह गए।
इस कहानी का संदेश केवल एक सियार और ढोल तक सीमित नहीं है। हमारे समाज में भी ऐसे अनेक लोग मिल जाते हैं, जो अपनी बातों, पद, प्रतिष्ठा या प्रभाव का खूब दिखावा करते हैं। उनकी बड़ी-बड़ी बातें सुनकर लोग उन्हें बहुत शक्तिशाली, बुद्धिमान या योग्य समझ लेते हैं। लेकिन जब वास्तविक परीक्षा का समय आता है, तो उनकी असलियत सामने आ जाती है।
बाहरी शोर हमेशा भीतर की ताकत का प्रमाण नहीं होता। कई बार जो सबसे ज्यादा शोर मचाते हैं, उनके पास दिखावे के अलावा कुछ नहीं होता। इसके विपरीत, वास्तविक योग्यता और क्षमता रखने वाले लोगों को अपनी महानता साबित करने के लिए अनावश्यक शोर मचाने की जरूरत नहीं पड़ती।
यह कहानी हमें एक और महत्वपूर्ण सीख देती है कि किसी की आवाज, दिखावे या बड़ी-बड़ी बातों से प्रभावित होकर उसके बारे में राय नहीं बनानी चाहिए। किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति की सच्चाई जानने के लिए विवेक, धैर्य और तथ्यों की जांच जरूरी है।
इसीलिए कहा जाता है कि ‘ढोल की पोल खुल गई।’ अर्थात जब दिखावे का पर्दा हटता है, तो भीतर की वास्तविकता सबके सामने आ जाती है।
निष्कर्ष: जीवन में किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके शोर या दावों से नहीं, बल्कि उसके कर्म, चरित्र और वास्तविक क्षमता से करना चाहिए। क्योंकि खोखला ढोल चाहे कितना भी जोर से बजे, उसकी पोल एक न एक दिन खुल ही जाती है।