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Editorial

रावण भीतर का जले, बात बने फिर खास

रावण भीतर का जले, बात बने फिर खास
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Naresh Kumar

Oct 20, 2026

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विजयादशमी पर भीतर के रावण का दहन करें और राम के आदर्श अपनाएँ।

रावण भीतर का जले, बात बने फिर खास

विजयादशमी का वास्तविक अर्थ और हमारे भीतर जीवित रावण की प्रवृत्तियाँ

अनेक किंवदंतियों के बीच पता नहीं कब और क्यों रावण के पुतले जलाने की परंपरा की शुरुआत हुई? इसी कड़ी में एक प्रथा (जिसे हम त्योहार भी कहते हैं) बन गई कि हर वर्ष विजयादशमी के अवसर पर रावण का पुतला दहन होता है, होता भी रहेगा और साथ में उसी के परिवार के एक-दो सदस्यों के साथ। पुतला दहन के बारे में अनेक बातें प्रचलित हैं।

यह सही है कि एक दिन ऐसा जरूर था, जब मानवता के आदर्श, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अहंकार, अभिमान, अन्याय और क्रोध से सराबोर रावण का दहन जरूर किया था। निश्चित रूप से वह पर्व था, क्योंकि असत्य पर सत्य विजयी हुआ, अहंकार पर नम्रता की विजय हुई। पर अब बरसों-बरस से रावण की प्रवृत्ति तो जिंदा है, मगर उसे हर साल जलाते हैं। गजब तो है कि जब कोई राम ही नहीं, फिर रावण को रावण ही क्यों जला रहा है?

दुर्भाग्य से रावण की प्रवृत्ति निरंतर बढ़ रही है और राम की प्रवृत्ति लगातार घट रही है, पर मुखौटा राम का है। वर्तमान दौर में मेरे ही लिखे दोहे के माध्यम से अगर यह कहा जाए, तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी कि—

पग-पग पै रावण खड़ै, न्यूँ करतै परिहास।
राम गया बनबास म्हैं, लुटती सीता आज॥

शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि हकीकत यही है और वर्तमान दौर में तो लोग रावण से भी ज्यादा कोई सत्ता के अहंकार में चूर है, कोई धन के अहंकार में चूर है, कोई रूप के, कोई ताकत के, कोई परिवार के, कोई एरिया के, कोई गोत्र के, कोई धर्म के, कोई ऊँची जाति के, कोई पावर के, कोई धौंस में चूर है।

कहाँ है राम, कहाँ है मर्यादा, कहाँ है न्याय, कहाँ है समर्पण, कहाँ है सत्य, कहाँ है आदर्श, कहाँ है मानवता, कहाँ है अपनत्व? वो सत्कार जो राम ने अपनी उसी मौसी का किया था, जिसने उसे वनवास दिलाया था, आज तो खुद के पुत्र उतना सत्कार नहीं करते।

कौन निभाता है आज के दौर में दिए हुए वचन? हर रोज तो लोग वादे तोड़ते हैं, साथ छोड़ते हैं, दगा करते हैं, पीठ में छुरे घोंपते हैं, स्त्रियों की अस्मत लूटी जाती है और फिर हम सभी, जो निरंतर रावण की प्रवृत्ति से लैस हैं, पहुँच जाते हैं रावण को जलाने के लिए।

और फिर यह सब देखकर रावण वैसा ही अट्टहास करता है, जैसा तब करता था, बल्कि उससे कहीं ज्यादा। क्योंकि तब तो उसे कुछ न कुछ शर्म-लिहाज थी क्योंकि उसके सामने माता सीता थी, मानवता के आदर्श श्रीराम थे। पर अब तो उसके सामने ऐसा कोई भी नहीं है, बल्कि वह और अधिक शक्तिशाली होकर जिंदा है और बड़ी आसानी के साथ अपने कार्यों को अंजाम दे रहा है।

गजब है कि हम नशे का पुतला नशा करके जला रहे हैं। तभी तो सत्यबीर नाहड़िया ने उचित ही लिखा है कि—

आज दसेरा पै दिखे, बात मिलै या आम।
रावण तै पग-पग खड़े, नहीं दीखता राम॥

नहीं दीखता राम, काम हों उलटे न्यारै।
लुटती इज्जत रोज, दीखते दिन म्हैं तारे॥

कितै भरसटाचार, कितै महँगाड़ा डेरा।
कितणे रावण देख, गिणावै आज दसेरा॥

सच में हकीकत यही है और हम हैं कि नशे का रावण जलाकर खुश हो जाते हैं, अखबारों में सुर्खियाँ पा जाते हैं, ब्रेकिंग न्यूज में आ जाते हैं कि देखो हमने नशे का रावण जला दिया और उधर नशे का कारोबार बढ़ता ही जाता है।

काश! हम हमारे इन पावन-पवित्र त्योहारों का वास्तविक अर्थ समझकर खुद के भीतर बैठे रावण का दहन कर पाएं और राम के आदर्शों को अपने जीवन में अपना पाएं, तब जाकर सब सार्थक होगा और यही उचित भी होगा।

क्योंकि मेरा एक दोहा भी है कि—

रावण भीतर का जले, बात बने फिर खास।
जीवन भी हो राम सा, राम आस विश्वास॥

बहरहाल, विजयादशमी की बधाई।

🙏 विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏

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