Nabh Chhor
Editorial

बड़े धोखे हैं जिंदगी की राहों में: इश्क ही नहीं, हर कदम पर छल का जाल

बड़े धोखे हैं जिंदगी की राहों में: इश्क ही नहीं, हर कदम पर छल का जाल
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Naresh Kumar

Sep 01, 2026

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धोखा केवल प्रेम और रिश्तों तक सीमित नहीं रहा। मिलावट, नकली दवाइयों, शिक्षा, बीमा, ऑनलाइन ठगी, परिवार और मीडिया तक इसके अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। पढ़िए वर्तमान समाज में बढ़ते छल और भरोसे के संकट पर यह संपादकीय।

धोखा केवल प्रेम और रिश्तों तक सीमित नहीं रहा। मिलावट, नकली दवाइयों, शिक्षा, बीमा, ऑनलाइन ठगी, परिवार और मीडिया तक इसके अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं। पढ़िए वर्तमान समाज में बढ़ते छल और भरोसे के संकट पर यह संपादकीय।

बड़े धोखे हैं-जिंदगी की राहों में

अक्सर शायरी में देखने/सुनने को मिलता है कि धोखा प्रेम से संबंधित है। क्योंकि तभी तो अक्सर शायरी में वफा-बेवफाई की बात होती है, क्योंकि प्रेमी/प्रेमिका धोखा खाए होते हैं। वर्तमान दौर में जो इश्क फरमाया जाता है, उसके लिए वफा शब्द कोई मायने नहीं रखता है।क्योंकि वर्तमान दौर में इश्क सिर्फ कहने के लिए है, इश्क के नाम पर सिर्फ वासना बची है। खैर, हमारा विषय है धोखा-मतलब आजकल धोखा कहाँ नहीं है? बस इश्क बदनाम है और बाकी बद हैं

जबकि कहावत यह है कि बद से बदनाम बुरा होता है। यानि कि इश्क जो बदनाम हो गया, वह बुरा बन गया जबकि जो बद हैं, वो ज्यादा परेशान करते हैं मगर बदनाम नहीं होते? देखिए! धोखा तो आजकल हर मनुष्य की नस-नस में ऐसे बह रहा है जैसे मानव शरीर की नाड़ियों रक्त का संचार हो रहा हो। सबसे पहले राजनीति को देखिए कि यहां धोखे के अलावा कुछ होता ही नहीं, शायद इस संदर्भ में अधिक कुछ कहने की जरूरत नहीं है।कमाल तो इससे आगे होता है कि लोग धोखे से दाल, चीनी, चावल में मिलावट करके बेचते हैं और कसम खाते हैं कि हम तो ऐसा काम करते ही नहीं?

गजब तो तब होता है जब दूध तक में, दूध से बनने वाली तमाम वस्तुओं में मिलावट करके धड़ल्ले से बेचा जा रहा है और अमीर बना जा रहा है। हैरत तो तब होती है जब बीमार आदमी को असली पैसे देकर नकली दवाइयाँ मिलती है और आदमी ठीक होने की बजाय दुगुना बीमार होता जाता है। आश्चर्य तो तब होता है जब लैब तक में लोग सैम्पल लेकर ऐसी रिपोर्ट देते हैं कि जो बीमारी आदमी को होती नहीं, वही बता देते हैं ताकि पैसे कमाए जा सके। कमाल तो तब होता है

जब शिक्षालय में टीचर सहायक पुस्तिका से सब काम करवाता है और छात्र की पुस्तिका में नोट भर देने से अपना काम चला लेता है क्योंकि आगे काम अभिभावक का होता है और उस पर हैरानी इस बात की कि छात्र भी बिना कहीं अपना दिमाग लगाए सब कुछ गूगल बाबा से पूछ लेता है। धोखा, कहाँ नहीं है। अभी तो पिछले दिनों एक राज्य में भगवान के प्रसाद में धोखा मिलने की खबरें सुनने को मिली। यहाँ तक कि जीवन बीमा में, बीमा करने वाले एजेंट धोखा कर देते हैं, बताते कुछ हैं और फिर पाता कुछ है और मिलता कुछ है। खाने में कितना बड़ा धोखा चल रहा होता है कि तीन-तीन दिन की बासी दाल को ऐसा तड़का लगाकर परोसते हैं कि खाने वाला उँगलियाँ चाटता रह जाए।

यहाँ तक अब तो कवियों तक में जबरदस्त धोखाधड़ी सिर चढ़कर बोल रही है। किसी की रचना में थोड़ा फेरबदल कीजिए और सुना मारिए, तालियां बटोरिये, आनंद लीजिए और तो और पुरस्कारों में अजीबोगरीब किस्म का धोखा हो रहा है, पैसे आपसे ही लिए जाते हैं और जैसा पुरस्कार देने की बात होती है, वह नहीं बल्कि उससे अलग पुरस्कार मिलता है, लेने वाला भी सोचते-सोचते बीमार हो जाता है। बेचारा अखबारों में खबर छपवाने के लिए फिर से धोखा खा जाता है।

यहाँ तक मीडिया में बड़ा धोखा चल रहा है क्योंकि जो दिखाना चाहिए, वह दिखाया नहीं जा रहा और जो नहीं दिखाना चाहिए, वह जबरन ठूंसा जा रहा है। ऐसे ही प्रिंट मीडिया का हाल है,जो पढ़ाया जाना है, वो लिखा नहीं जा रहा है और जो लिखा-छापा जा रहा है, वह पढ़ने योग्य नहीं बल्कि दिमाग को खराब करने का काम कर रहा है। गजब के धोखे हैं आजकल। आजकल तो परिवारों में धोखाधड़ी है। परिवार के जन ही एक दूसरे के खिलाफ षडयंत्र रचते पाए जाते हैं और ऊपर से इतने मीठे बोलते हैं कि खुद शुगर को भी शर्म आ जाती है मगर धोखा देने वालों को नहीं।

रिश्तों तक में धोखा देखा गया है कि दिखाते कुछ हैं और फिर पाते कुछ हैं। तो साहब! इश्क में धोखा तो यों ही बदनाम हो गया जबकि धोखे का कारोबार तो आजकल सभी जगह ही हो रहा है। कहाँ-कहाँ से बचोगे जी? बस! धोखा तो वारंटी-गारंटी में भी हो रहा है वर्तमान दौर में। और तो और आजकल तो आॅनलाइन भी धोखे हो जाते हैं। ये फोन तो इतने धोखे करवाता है कि रिश्ते तक टूट जाते हैं। खैर, फिर भी प्रेम जीतता जरूर है बेशक जीते आखिर में पर जहाँ तक संभव हो धोखा देने से परहेज किया जाए तो ही अच्छा होगा।

 

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