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Editorial

मोबाइल बना मालिक, इंसान बना नौकर: आखिर कब संभलेंगे हम?

मोबाइल बना मालिक, इंसान बना नौकर: आखिर कब संभलेंगे हम?
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Naresh Kumar

Sep 11, 2026

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मोबाइल की बढ़ती लत बच्चों से बुजुर्गों तक जीवन, रिश्तों और दिनचर्या को प्रभावित कर रही है। संपादकीय में इसी गंभीर स्थिति पर चिंता जताई गई है।

मोबाइल की बढ़ती लत बच्चों से बुजुर्गों तक जीवन, रिश्तों और दिनचर्या को प्रभावित कर रही है। संपादकीय में इसी गंभीर स्थिति पर चिंता जताई गई है।

खिलौनों पर रीझना एक अलग बात है और खिलौने को ही अपनी जान बना लेना दूसरी बात है।खिलौना मेरे लिए है और खिलौने के लिए मैं हूँ,इन दोनों बातों में बड़ा अंतर है।और हैरत है कि पूरी दुनिया को इसके बीच का अंतर समझ नहीं आ रहा।

कैसा वक्त आ गया है?इस संदर्भ में कम से कम हमारे देश के लोगों को तो समझ नहीं आ रहा कि आखिर हम सब खिलौने के इतने गुलाम क्योंकर होते जा रहे हैं?जहाँ तक बात हरियाणा की है तो हरियाणवी लोगों को भी नहीं समझ आ रहा है कि आखिर कैसे एक खिलौने के गुलाम होते जा रहे हैं?गजब की बात यह है कि जो पीढ़ी आने वाले कल का ख्याल करेगी,जिसके कंधों पर भविष्य की सभी जिम्मेदारियां होंगी,उसकी स्थिति तो और भी अधिक भयावह है।

आप देखिए ना!हर छात्र के हाथ में वह खिलौना है।हर छोटे बच्चे के हाथ में है।हर बुजुर्ग के हाथ में वही खिलौना है।अब तो कामकाजी तो कामकाजी,घरेलू महिलाएं इस खिलौने की गिरफ्त में आ चुकी हैं।ऐसा होते-होते हुआ यों कि यही खिलौना हमारी जान बन गया।हमारी जिंदगी बन गया।हमारी सांस बन गया।कोई भी व्यक्ति इस खिलौने के बिना नहीं रह सकता जबकि खाने के बिना रह सकता है।

नहाने के बिना रह सकता है।पैसे के बिना भी थोड़ा रह सकता है। और तो और सांस लिए बगैर भी रह सकता है मगर मात्र दो मिनट के लिए वही खिलौना गुम हो जाए तो ऐसे लगता है कि जैसे भूचाल आ गया हो,पूरी दुनिया खत्म हो गई हो,सब कुछ समाप्त हो गया हो।दिल की धड़कन इतनी बढ़ जाती है कि ब्लड प्रेशर मापने वाली मशीन का सारा गणित गड़बड़ा जाता है। और यदि उसी वक्त वही गुम हुआ खिलौना मिल जाए,तो फिर किसी दवाई की जरूरत नहीं होती।

आज का मानव कितना गुलाम हो गया इस खिलौने का?शायद इसकी कल्पना भी नहीं की गई होगी और यकीन मानिए यह स्थिति बहुत ही खतरनाक है।इतनी खतरनाक है कि यदि समय रहते हम सब नहीं संभले तो फिर यकीन मानिए आज के बच्चे कल को बिना मस्तिष्क के होंगे,किसी को भी नींद नहीं आएगी,अवसाद इतना हो जाएगा कि किसी को कुछ भी समझ नहीं आएगा?

अगर हम गौर से देखें तो पता चलेगा कि खेत हो,खलिहान हो,स्कूल हो,घर हो,कार्यालय हो सब जगह सभी केवल उसी खिलौने में घुसे हैं।यहाँ तक कि किसी के घर संवेदनाएं व्यक्त करने गए हैं,तब भी उसी खिलौने में व्यस्त हैं।बस में यात्रा कर रहे हों,रेल का सफर हो या जहाज की यात्रा हो,हर कोई इसी खिलौने में व्यस्त है।पार्क में टहलने गए हों,टहलना छोड़,खिलौने से खेल रहे हैं।सिनेमा हॉल में मूवी देख रहे हैं पर उंगलियां उसी खिलौने पर चल रही हैं।

गजब तो तब हो जाता है कि बाइक/कार चला रहे हैं और उसी खिलौने में इतने व्यस्त हैं कि हमें पता नहीं चल रहा कि आस-पास से कौन गुजर रहा है?और कब,क्या हादसा घट रहा है?इससे भी बड़ी हैरानी यह है कि यंगस्टर बच्चे/बच्चियाँ तो पैदल चलते हुए भी इसी खिलौने में इतना मस्त हैं कि टक्कर तक हो जाती है और फिर उनके मुँह से केवल एक शब्द निकलता है--सॉरी।लेकिन गजब है कि सुधार फिर भी नहीं आता।

आप यकीन मानिए या न मानिए मगर यह सत्य है कि इसी खिलौने की आदत से देश की अस्सी फीसदी से ज्यादा लोग बीमार हो चुके हैं।और यह बीमारी नींद की है,आँखों की है,नजर की है,दिल की है,अवसाद की है,घृणा की है और पता नहीं क्या-क्या?क्या हम उस खिलौने का नाम नहीं जानना चाहेंगे--जी वह खिलौना है--मोबाइल, जिसे हमने अपना मालिक बना लिया है और हम बन चुके हैं नौकर।खुदा खैर करे।

 

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