रिश्तों को बचाना है तो आत्मीयता बरतें: अपनापन और अहसास ही रिश्तों की असली नींव
Naresh Kumar
Aug 29, 2026
आज स्वार्थ और भौतिकता के दौर में रिश्तों की डोर कमजोर होती जा रही है। श्रीराम और भरत के प्रसंग से सीख मिलती है कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पीड़ा समझने, आत्मीयता, प्रेम और सच्चे अहसास से टिकते हैं।

रिश्तों को बचाना है तो... आत्मीयता बरतें
आज के भौतिकवादी युग में सबसे ज्यादा कहर रिश्तों पर टूट रहा है। भाई, भाई ना रहा। बहन, बहन नहीं रही और पति-पत्नी के रिश्ते हर रोज तलाक ले रहे हैं और जो तलाक नहीं ले रहे, वो तिल-तिलकर सिसक रहे हैं। परिवार विखंडित हो रहे हैं, रिश्तेदारी स्वार्थी हो रही हैं।
कोई किसी का ख्याल नहीं रख रहा? पिता-पुत्र के रिश्ते सवालों के घेरे में हैं। आजकल दोस्ती, तो जैसे गए जमाने की बात हो गई है। बस! स्वार्थ के रिश्ते तब तक बचे हैं जब तक स्वार्थ पूरा नहीं होता। इधर स्वार्थ सिद्ध हुआ, उधर सब कुछ झटके में समाप्त। यह सवाल सबके जहन में चोट करता है कि आखिर ऐसा क्यों है? तो जवाब में सबसे पहले विज्ञान के नियम को लेते हैं कि एक्शन है, तो रिएक्शन जरूर होगा यानि क्रिया की प्रतिक्रिया होना एक शाश्वत नियम है। लेकिन हम नहीं मानते और परिणाम भुगत रहे हैं।
अब आते हैं एक ऐसे प्रसंग पर, जिसे हमने सुना होगा मगर माना नहीं क्योंकि हम बहुत कुछ सुनते हैं, पढ़ते हैं मगर मानते रत्ती भर भी नहीं। एक प्रसंग इस प्रकार है कि श्री राम, लक्ष्मण एवं सीता मैया चित्रकूट पर्वत की ओर जा रहे थे। राह बहुत पथरीली और कंटीली थी। यकायक श्री राम के चरणों मे कांटा चुभ गया। श्रीराम रूष्ट या क्रोधित नहीं हुए, बल्कि हाथ जोड़कर धरती माता से अनुरोध करने लगे, बोले कि मां, मेरी एक विनम्र प्रार्थना है आपसे, क्या आप स्वीकार करेंगी?
धरती मां बोली कि प्रभु प्रार्थना नहीं, आज्ञा दीजिए। प्रभु बोले कि मां, मेरी बस यही विनती है कि जब भरत मेरी खोज मे इस पथ से गुजरे, तो आप नर्म हो जाना। कुछ पल के लिए अपने आंचल के ये पत्थर और कांटे छुपा लेना। मुझे कांटा चुभा सो चुभा, पर मेरे भरत के पांव में आघात मत करना। श्री राम को यूं व्यग्र देखकर धरा दंग रह गई। पूछा कि भगवन, धृष्टता क्षमा हो! पर क्या भरत आपसे अधिक सुकुमार हैं? जब आप इतनी सहजता से सब सहन कर गए तो क्या कुमार भरत सहन नही कर पाएंगे? फिर उनको लेकर आपके चित्त में ऐसी व्याकुलता क्यों? श्री राम बोले कि नहीं-नहीं माते, आप मेरे कहने का अभिप्राय नहीं समझीं।
भरत को यदि कांटा चुभा तो वह उसके पांव को नहीं, उसके हृदय को फाड़ देगा। हृदय फट जाएगा? ऐसा क्यों प्रभु? धरती मां जिज्ञासा भरे स्वर में बोलीं। अपनी पीड़ा से नहीं मां, बल्कि यह सोचकर कि इसी कंटीली राह से मेरे भैया राम गुजरे होंगे और ये शूल उनके पगों मे भी चुभे होंगे। हे धरती मैया, मेरा भरत कल्पना में भी मेरी पीड़ा सहन नहीं कर सकता, इसलिए उसकी उपस्थिति में आप कमल पंखुड़ियों-सी कोमल बन जाना। अर्थात रिश्ते अंदरूनी अहसास, आत्मीय अनुभूति के दम पर ही टिकते हैं।
जहां गहरी आत्मीयता नहीं, वह रिश्ता गंभीर नहीं परंतु दिखावा हो सकता है। इसीलिए कहा गया है कि रिश्ते खून से नहीं, परिवार से नहीं, मित्रता से नहीं, व्यवहार से नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ आत्मीय अहसास से ही बनते और निर्वहन किए जाते हैं। जहां अहसास ही नहीं, आत्मीयता ही नहीं, वहां अपनापन कहां से आएगा? सच में यदि हम सभी एक दूसरे के प्रति इस तरह के आत्मीय भावों से भर जाएं, तो निसंदेह रिश्तों में प्रेम होगा और टूटन से बच जाएंगे। और यही प्रेम है और यही इबादत है।