कूटनीति का नजरिया: क्या जनहित वास्तव में जनहित है?
Naresh Kumar
Aug 20, 2026
रोटी के दाम से जुड़ी यह कहानी दिखाती है कि कैसे कूटनीति से महंगे फैसलों को भी जनहित बताकर जय-जयकार कराई जाती है। व्यवस्था की इस चालाकी को समझने और सही स्थिति बनाए रखने के लिए सवाल पूछना बेहद जरूरी है।

अपने-अपने देखने का नजरिया
सोशल मीडिया पर एक वीडियो देखी। अच्छी लगी जो कि घर-घर की कहानी-सी है। वैसे मैं कम ही सोशल मीडिया पर भरोसा करता हूँ मगर यह वीडियो देख ली। इस वीडियो में एक छोटी-सी कहानी थी कि एक राजा था। उसके राज्य में कोई भी उसकी बिना अनुमति किसी भी किस्म का व्यापार नहीं कर सकता था। कोई भी अपनी चीजों का भाव बिना राजा की अनुमति के नहीं बढ़ा सकता था। अर्थात किसी भी कार्य के लिए पहले राजा से अनुमति लेनी बहुत आवश्यक थी।
उसी राज्य में एक व्यक्ति रोटी बेचने का काम करता था और वह दस रुपए की रोटी बेचता था। एक दिन उसने सोचा कि क्यों ना रोटी बीस रुपये की बेची जाए मगर इसके लिए उसे सबसे पहले राजा की अनुमति की जरूरत थी। वह डर रहा था कि कहीं राजा उसे सजा ना दे दे।
उसी कारण से वह राजा के पास नहीं जा रहा था लेकिन एक दिन हिम्मत करके वह राजा के पास गया और उसने अपना अनुरोध निवेदन का डाला। उस रोटी के व्यापारी ने कहा कि वह चाहता है कि अब रोटी को दस रुपये में न बेचकर बीस रुपये में बेचूँ। उसकी बात राजा ने सुना और उसे तत्काल आदेश दिया कि बीस में क्यों तुम रोटी पचास रुपये में बेचो। व्यापारी एकदम हैरान कि वह तो सिर्फ बीस रुपये में बेचना चाहता था मगर राजा ने तो कीमत पचास रुपये ही तय कर दी और फिर क्या था।
व्यापारी तो अगले ही दिन से जो रोटी दस रुपये की बेचता था,उसे पचास रुपये में बेचने लगा। फिर क्या था लोगों में हाहाकार मच गया और तमाम जनता इक्कठी होकर राजा के दरबार में गुहार लगाने जा पहुँची। राजा ने जनता की बात पूरे ध्यान से सुनी और तत्काल आने सैनिकों को आदेश दिया कि रोटी बेचने वाले व्यापारी को पकड़कर दरबार में पेश किया जाए। राजा के आदेश की तामील हुई और रोटी के व्यापारी को पकड़कर राजा के सामने दरबार में पेश किया गया।
व्यापारी थोड़ा डरा हुआ था और राजा पूरे गुस्से में था। जैसे ही राजा के सामने उस व्यापारी को लाया गया। तत्काल राजा ने उस व्यापारी को पूरे गुस्से में धमकाया और कहा कि तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम रोटी पचास रुपये में बेच रहे हो, तुम्हें शर्म नहीं आती, तुम्हारे अंदर मानवता नाम की कोई चीज नहीं है। व्यापारी बेचारा दोषी की भांति खड़ा रहा और राजा के अंतिम निर्णय को सुनने के इंतजार में कांपता रहा।
राजा ने प्रजा की उपस्थिति में रोटी के व्यापारी को हुक्म दिया कि अब तुम पचास में नहीं बल्कि पच्चीस रुपये में रोटी बेचा करोगे। इतना सुनते ही प्रजा में खुशी की लहर दौड़ गई और वो राजा की जय जयकार के नारे लगाते हुए अपने-अपने घरों की ओर चले और रोटी का व्यापारी भी राजा का शुक्रिया कहकर अपने गंतव्य स्थल की ओर रवाना हो गए मगर वह जाते वक्त सोच रहे थे कि कमाल है कि मैंने तो सिर्फ दस रुपये ही बढ़ाने चाहे थे मगर राजा ने तो मेरे पन्द्रह रुपये बढ़ा दिए और प्रजा को भी शांत कर दिया।
मतलब यह हुआ एक सफल राजा वही ही जो हर काम बड़ी कूटनीति से करता है ताकि सब काम ऐसे लगे कि जैसे वो जनहित के हों और उनसे जनता इतनी खुश हो कि जय जयकार करने लग जाये। वैसे इस छोटी-सी कहानी को किसी भी तरह से राजनीति से जोड़कर न देखा जाए मगर सच यह भी है कि आजकल घर-घर में यह हो रहा है। खैर, हम सबको सवाल जरूर पूछने चाहिए, बेशक वे सवाल अपने ही घर के मुखिया से क्यों ना हों? सवाल उठाना बहुत ही जरूरी है, नहीं तो उसी तरह से जीना पड़ेगा।