बदलते दौर के सवाल: शिक्षा, रोजगार, आरक्षण और समाज के बीच आखिर हम कहां खड़े हैं?
Naresh Kumar
Aug 27, 2026
शिक्षा, परीक्षा, रोजगार और आरक्षण से लेकर सफाई कर्मियों की हड़ताल व सामाजिक भेदभाव तक कई सवाल आज हमारे सामने हैं। बदलते दौर में आंदोलनों और सरकारी नीतियों के बीच समाज की संवेदनशीलता और आपसी संवाद पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
कुछ दिन पहले इस खबर ने सबको चौंकाया कि जेन-जी ने जंतर-मंतर से आंदोलन करके शिक्षा,परीक्षा के मुद्दे को केंद्र में ला दिया और जो गोदी मीडिया उस आंदोलन से आंख बंद किए हुए था,उसे उस जंतर-मंतर के आंदोलन के समाप्त होने के बाद झारखंड के जेन-जी का आंदोलन मानों संजीवनी दे गया और अब बिहार में वही सब हो रहा है।
गजब की बात है कि इन आंदोलनों ने एक बात तो साफ कर दी कि सरकार किसी की हो,चरित्र सबका एक जैसा ही होता है मगर कुछ देर के लिए ही सही पर शिक्षा,परीक्षा और रोजगार केंद्र में तो आया।खैर,जिस जंतर-मंतर से जेन-जी सफलता का परचम लहरा कर उठा था,उसी जंतर-मंतर से फिर एक आंदोलन कई दिनों से गरमा-गरम है और यह कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए,व क्रीमी लेयर लागू की जानी चाहिए मगर उन लोगों को यह नहीं पता कि आर्थिक उन्नति का अभिप्राय यह नहीं होता कि लोग सामाजिक रूप से भी उन्नत हो गए हों,अगर ऐसा होता तो सम्भवतः करोड़ों के मालिक खड़गे की सभा के बाद उस जगह का शुद्धिकरण न किया जाता,बस यही बात बताती है कि आरक्षण की जरूरत अभी है,
क्योंकि खड़गे का एक उदाहरण ही नहीं,लाखों उदाहरण हैं,कहीं घुड़चढ़ी रोकने के,कहीं अलग कुओं के,कहीं अलग श्मशानों के,कहीं पानी न भरने के,कहीं कुछ यानि जाति के नाम पर दोयम दर्जे का व्यवहार गया नहीं है और बात करते हैं आरक्षण की समीक्षा की और वह भी तब जब बाकी का अस्सी प्रतिशत उन्हें ही मिल रहा है जो आरक्षण हटवाने पर आमादा हैं। खैर,सबको आजादी है अपनी बात कहने की,ओर कही भी जानी चाहिए पर यह जो जेन-अल्फा ने किया है,उसने तो सबकी बोलती ही बंद कर दी और वह ऐसे कि बिजली,पानी,सड़क,शिक्ष,मिड-डे-मील पर आवाज उठाकर देश को सन्न कर दिया और सरकारों को पाबंदी के फरमान जारी करने पड़े,जो हमें प्रभावित नहीं कर रहे क्योंकि हम संवेदनशून्य जो हो चुके हैं।
अभी हाल ही में नीति आयोग ने रीइमैजिनिंग सिकलिंग फ़ॉर विकसित भारत @2047 रिपोर्ट में खबर यह है कि देश भर में 15 से 29 आयुबर्ग के लगभग आठ करोड़ से ऊपर युवा न तो पढ़ रहे हैं और न ही उनके पास रोजगार है।पिछले दिनों भी एक खबर आई थी कि कोर्ट का कहना है कि लिव-इन को शादी की तरह मान्यता है, इसलिए इसमें माँ-बाप दखलंदाजी न करें क्योंकि यह न्यायसंगत है।
खबर यह भी है कि डेरा प्रमुख दो माह बाद फिर से पैरोल पर बाहर,नौ साल में उसे 17वीं बार पैरोल मिली है।खबर तो यह भी है कि हरियाणा में पिछले बीस दिनों से नगरपालिका के कर्मी अपनी मांगों को लेकर हड़ताल पर पर शहर दर शहर कूड़े के ढेर लगे हैं मगर बताते हैं कि कभी इन्हीं सफाई कर्मियों पर फूल बिखेरे गए थे और मजे की बात तो यह है कि नेता,अभिनेता,सामाजिक लोग जो फोटो खिंचाऊं सफाई अभियान चलाकर अखबार की सुर्खियां बटोरते थे,उनमें से अब कोई सफाई के लिए आगे नहीं आ रहा और आरक्षण माँगने वाले तो इससे कतई परहेज करते हैं।
यह नया दौर है साहब इसलिए इस दौर में यह बात हमेशा याद रखिए कि आप किसी अपने से बात करना चाहते हैं तो फिर फ़ोन मत उठाइए बल्कि उसे एक तरफ रख दीजिए और दिल खोलकर बैठकर बात कीजिए वरना फ़ोन तो पता नहीं क्या-क्या खा गया जनाब।
