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Editorial

बिन ईश्वर के हम कुछ भी नहीं: अहंकार छोड़ विनम्रता और समर्पण में ही सच्चा बल

बिन ईश्वर के हम कुछ भी नहीं: अहंकार छोड़ विनम्रता और समर्पण में ही सच्चा बल
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Naresh Kumar

Aug 22, 2026

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मनुष्य का स्वयं को सर्वशक्तिमान मानना केवल भ्रम है। जीवन, प्रकृति और हर सांस ईश्वर की कृपा पर निर्भर है। सुख-दुख को सहज स्वीकार कर अहंकार त्यागने, विनम्र रहने और परमात्मा पर विश्वास रखने में ही जीवन का सच्चा आनंद है।

मनुष्य का स्वयं को सर्वशक्तिमान मानना केवल भ्रम है। जीवन, प्रकृति और हर सांस ईश्वर की कृपा पर निर्भर है। सुख-दुख को सहज स्वीकार कर अहंकार त्यागने, विनम्र रहने और परमात्मा पर विश्वास रखने में ही जीवन का सच्चा आनंद है।

बिन ईश्वर के हम कुछ भी नहीं

आप सहज में किसी को कमजोर कहिए और फिर उसकी प्रतिक्रिया देखिए। आप दंग रह जाएंगे क्योंकि कोई भी मनुष्य खुद को कायर, निर्बल, अक्षम कहलाना पसंद नहीं है। हर आदमी की चाहत है कि हर कोई उसे बलवान माने, इसलिए वह वह सदैव खुद वीर, बहादुर, सक्षम दिखना चाहता है।

जबकि सत्य, तथ्य यह है कि आपका, मेरा, इसका,उसका स्वयं को बलशाली मान लेना कोरा दंभ है, एक तरह का वहम है क्योंकि असल बात यह है कि हम वास्तव में निर्बल हैं, बिना ईश्वर के बल के, जिस दिन ईश्वर अपने बल को वापिस ले लेता है, उसी क्षण हम बड़ी जीरो हो जाते हैं। जिसने भी अपने बलवान होने का भ्रम पाला है उसे इसका पूरा मूल्य चुकाना पड़ा है।

यकीन नहीं आता हो तो एक बार रावण को याद कर लेना जिसकी सोने की  लंका तक नहीं बची। जिनके पक्ष में बड़े से बड़े महारथी लड़ रहे थे, उन्हीं कौरवों को विनाश का मुंह देखना पड़ा। लेकिन सवाल यह है कि आदमी ऐसा भ्रम क्योंकर और कब पालता है? तो इसका सीधा सा उतर है कि सच को दरकिनार करके और मनुष्य यह दंभ तभी पालता है, जब उसे अपना जन्म-मृत्यु को भूल जाता है।

जबकि सत्य यह भी है कि किसी भी मनुष्य को संसार में जन्म लेने के लिए उसे नौ माह तक माता के गर्भ में रहना पड़ा। जब वह संसार में आया तो बैठने, चलने, बोलने के लिए, खाने,पीने और जीवन यापन के लिए  दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। हैरत की बात है और यही कड़वी सच्चाई भी है कि मनुष्य कितनी ही धन-दौलत, ऐशो-आराम के साधन जुटा लें मगर तमाम तरह के इंतजामात के बाद भी वह सांस लेने के लिए हवा पर, पीने के लिए आजीवन जल पर निर्भर रहना पड़ता है। निश्चित रूप से उसे आधार के लिए धरती चाहिए।

धरती ने न केवल मनुष्य को स्थिरता दी है, बल्कि उसे क्षुधा तृप्ति के लिए वनस्पतियां एवं फल भी दिए हैं। इस प्रकार मनुष्य का जीवन दूसरों पर आश्रित तो है ही, उसका अपनी मृत्यु पर भी कोई नियंत्रण नहीं है। यदि वायु, जल और धरती न हों तो जिन्हें वह अपना बल मानता है वे सारे अर्थहीन हो जाएंगे। जब मृत्यु दस्तक देती है तब वे सभी मिथ्या साबित हो जाते हैं, जिन्हें वह अपना बल मानता है। स्पष्ट है मनुष्य स्वयं को बलशाली मान रहा है तो यह उसकी सबसे बड़ी अज्ञानता है।

ऐसा मनुष्य सच से टूटा होता है। वह परमात्मा की सत्ता को नकारता है, जिसके आधीन उसका जीवन है। हमेशा एक बात याद रखिए कि एक सेवक कभी भी स्वामी नहीं हो सकता। सेवक की आज्ञाकारिता उसकी निर्बलता नहीं, उसका चरित्र है, उसके लिए जरूरी भी है। जब मनुष्य को अपने सच्चे चरित्र का ज्ञान हो जाए तो उसके निर्वहन में सहजता आ जाती है। वह झूठे दंभ से बच जाता है। यदि वह विनम्र, सहज है तो बलशाली है। परमात्मा का भक्त होना मनुष्य के हित का मार्ग है।

वह ईश्वर का दास बनकर परमात्मा की कृपा एवं मोक्ष भी प्राप्त कर लेता है। मनुष्य को सदैव अपना असल ज्ञान याद रहे तो वह कभी विकारों से पराजित नहीं होगा और परमात्मा के आसरे में रहेगा। लोहे का कारीगर अपनी दुकान पर लोहे के टुकड़ों से तरह तरह की चीजें बनाता रहता है। उन टुकड़ों को वह कभी गरम करने के लिए भट्टी में तपाता है, कभी पानी में डालकर ठण्डा कर लेता है।

इन विसंगतियों को देखकर कोई भोला मनुष्य असमंजस में पड़ सकता है कि लोहे के कारीगर ने ऐसी प्रक्रिया को क्यों अपना रखा है? पर वह कारीगर जानता है कि किसी लोहे के टुकड़े को बढ़िया उपकरण की शक्ल में परिणत करने के लिये दोनों ही प्रकार की ठण्डी-गरम प्रणालियों का प्रयुक्त होना आवश्यक है। मनुष्य के जीवन में भी सुख-दुख का, धूप-छाँव का अपना महत्व है। रात-दिन की अँधेरी, उजली, विसंगतियाँ ही तो मनुष्य को सही स्वरूप प्रदान करती हैं।

यदि मनुष्य सदा सुखी और सम्पन्न ही रहे तो निश्चय ही उसकी आन्तरिक प्रगति रुक हो जाएगी। जो झटके प्रगति के लिए आवश्यक हैं उन्हें ही हम कष्ट कहते हैं। इन्हें सच्चा भक्त कड़वी दवाई की तरह ही स्वीकार करता है। जिस मरीज की चीरफाड़ करना जरूरी होता है, तो निसंदेह जो डॉक्टर यह काम करता है तो मरीज को थोड़ा अच्छा नहीं लगता मगर यह सब मरीज के लिए हित में होता है। ठीक ऐसे ही समझदार व्यक्ति कभी भी ईश्वर द्वारा दिए गए तमाम उपहारों को बिना इफ-बट के सहज में स्वीकार करता है क्योंकि उसे पता है कि उसका नियंता वही है और वह जो कर रहा है,वही उसके लिए सर्वोत्तम है। अत: वह कभी भी अहंकार नहीं करता और जन्म-मृत्यु को नहिज भूलता, साथ ही अपनी हकीकत को याद रखता है और इसका परिणाम यह होता है कि वह कभी भी उछलता नहीं है। आइए! हम भी सरलता के साथ, सहजता के साथ समर्पित भाव के साथ बिना अहम-वहम के जीवन का आनंद लें और मुहब्बत से परिपूर्ण बनें रहे।

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