स्वतंत्रता के 80वें वर्ष की पूर्व संध्या पर भारत की आत्मा की आवाज बनकर यह संपादकीय जातिवाद, धार्मिक वैमनस्य, संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी और आंकड़ों की विकास राजनीति पर सवाल उठाता है। इसमें समानता, सद्भाव, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, सुरक्षा और वास्तविक विकास के लिए मिलजुलकर आगे बढ़ने का आह्वान किया गया है।

मैं भारत बोल रहा हूं
मैं भारत हूं। वैसे आज विभाजन विभीषिका दिवस है, इसके जख्मों को मैं अभी तक सहला रहा हूं। कभी-कभी इसी बात को लेकर काफी दुख भी होता है लेकिन यह सोचकर कि चलो! जो हो गया, अब हो चुका है पर दर्द सालता रहता है। खैर, आज मेरा विषय दूसरा है और मेरा विषय यह है कि आज मैंने अपनी आजादी के उन्नासी वर्ष पूरे कर लिए हैं और 80वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर मेरा ह्रदय कह रहा है कि मैं भी लाल किले की प्राचीर से मेरे अंदर निवास कर रहे करोड़ों-करोड़ लोगों को संबोधित करूं।
वैसे कायदे से तो इसी लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री बोलते आए हैं। मैं उस परंपरा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं करना चाहता, इसीलिए मैं पूर्व संध्या पर लाल किले की प्राचीर से बोल रहा हूं। मैं भारत हूं और अपने ह्रदय के उद्गार रखना चाहता हूं। मेरे बोलों को भाषण मत समझना बल्कि शब्दों के माध्यम से यह मेरा दर्द है
जो मुझे स्वतंत्रता के अस्सी साल बाद तक भी परेशान कर रहा है। इसलिए हो सके तो मुझे अब जाति के बंधन से पूर्ण रूप से छुटकारा दे दीजिए। कोई ऐसा कानून बनाइए या फिर कुछ भी करिए, इस जाति के बंधन से मुझे मुक्त कर डालिए, जाति की पीड़ा से मुझे आजाद कीजिए क्योंकि मेरे भू-भाग पर बसने वाला हर कोई मेरा है और हर किसी की एक ही जाति है और वह है भारतीय, अत: जातियों के बंधन से मुझे मुक्त करते हुए भारतीय बनिए ताकि मैं सिर उठाकर जी सकूं क्योंकि जाति के नाम पर अमानवीय अत्याचार, नीचता, छुआछात मुझे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं है। प्लीज! इससे बाहर निकलिए और भारतीय बनकर भारतीयता से ओत-प्रोत होकर जीने का प्रयास कीजिए।
दूसरी बात यह कि यह जो धर्म के नाम पर जो भी हो रहा है या किया जा रहा है, इससे मुझे बहुत तकलीफ होती है, इसे बंद कीजिए क्योंकि मेरी तो विशेषता ही यही है कि मैं सबको अपने में समाहित कर लेता हूं और प्रेम बांटना मेरी फितरत रही है। हां, बेशक अपने-अपने धर्मों के अनुसार आचरण कीजिए मगर एक दूसरे से नफरत मत कीजिए, एक दूसरे के खिलाफ षड्यंत्र मत कीजिए, एक दूसरे से वैमनस्य मत कीजिए क्योंकि भारतीयता की पहचान ही प्यार है, मिलवर्तन है, सहयोग, सद्भाव, सहनशीलता और भाईचारा है, तभी तो मेरा नाम भारत है।
यही वो बात है कि जो मुझे धरती से मिटने नहीं देती। प्लीज! इसे खराब मत कीजिए क्योंकि मैं भारत हूं और संविधान मेरी आत्मा है। यह मैं तीसरी बात कहने जा रहा हूं। प्लीज! अपने निहित स्वार्थों के चक्कर में मेरी आत्मा पर चोट मत कीजिए क्योंकि मेरी आत्मा की पहली पंक्ति है कि हम भारत के लोग... यदि इसे आगे पढ़कर समझते हुए आगे बढ़ेंगे तो भविष्य बेहतर होगा और मेरी आत्मा पर चोट करके आगे बढ़ेंगे तो यह याद रखिए विनाश निश्चित है।
अत: संविधान के अनुसार चलिए, हर कार्य करिए, मेरा अनुरोध है कार्यपालिका, विधानपालिका, न्यायपालिका और मीडिया से कि किसी से कुछ भी पूछने की जरूरत नहीं है, सब कुछ मेरे अंदर लिखा हुआ है, मेरी आत्मा में दर्ज है, उसके अनुसार हर कार्य कीजिए। यकीन मानिए मुझे अच्छा लगेगा और यकीनन आपको भी अच्छा लगेगा।
मुझे तब बेहद दुख होता है कि मेरी आत्मा का नाम लेकर, इसकी शपथ लेकर, इसे हाथ में लेकर इसके खिलाफ ही काम किए जाते हैं। सच में तब मैं बहुत तड़फता हूं पर कुछ भी कह नहीं पाता हूं, मूक होकर सब कुछ देखता रहता हूं और हैरत है कि मेरे इस दर्द को कोई महसूस नहीं कर पाता। सोचता हूं कि कैसे लोग हैं आप, जो मुझ में रहकर ही मेरी आत्मा पर चोट करते हैं। वैसे मेरी बहुत अधिक उम्र है पर आजादी प्राप्त करने के बाद अब मैं अस्सी वर्ष का हो गया है, यह चोट मुझे अधिक दुख देती है, यों कहिए कि यह मेरे लिए इस उम्र में दारुण दुख है। प्लीज! इसे तत्काल बंद कीजिए। चौथी बात मैं यह कहना चाहता हूं कि विकास को, प्रगति को, उन्नति को कोई भी आंकड़ों की बाजीगरी से देखने का कृत्य न करें बल्कि यह देखें कि क्या कुपोषण पूर्ण रूप से खत्म हो गया है, क्या हर हाथ को स्थाई रोजगार मिल गया है, क्या महिला सुरक्षा पूर्ण रूप से चाक-चौबंद है, क्या सत्ता में बैठे लोग आम आदमी की आवाज सुनते हैं, क्या न्याय सर्वसुलभ है, क्या सबके लिए स्वास्थ्य मुहैया है, क्या शिक्षा व्यवस्था पूर्ण रूप से एकसमान है और तमाम सुविधाओं से लैस है, क्या परीक्षा प्रणाली लीक-प्रूफ है, क्या बिजली-पानी की व्यवस्था सही है, क्या परिवहन, सड़कें सही हैं, क्या हर व्यक्ति के लिए छत उपलब्ध है, क्या मानवीय गरिमा के साथ मेरा हर बेटा-बेटी अपना जीवन यापन कर रहा है, क्या सार्वजनिक विभागों का विस्तार हो रहा है, क्या सबके लिए स्वच्छ हवा उपलब्ध है आदि-आदि क्योंकि ये आंकड़ों से नहीं नापी जा सकती बल्कि इन्हें देखा जाना चाहिए और अगर यह सब नहीं हुआ है तो प्लीज! सब जन मिलकर इस ओर ध्यान दें ताकि असली विकास हो, प्रगति हो और मुझे भी आप सब पर अभिमान हो कि मेरे पुत्र-पुत्रियां आंकड़ों के खेल में नहीं उलझते बल्कि धरातल पर जाकर काम करते हैं।
बातें बहुत सारी कहने की इच्छा है पर मुझे पता है कि अब जमाना जेन-जी और जेन-अल्फा है, जो बहुत लंबा भाषण नहीं सुनना चाहते, इसलिए एक बात और कहना चाहता हूं वर्तमान दौर में, ये जो मैं अड़ियल राजनीति देख रहा हूं, यह ठीक नहीं है, प्लीज! इसे बंद कीजिए और मिलजुलकर काम करने की आदत विकसित करते हुए विश्व गौरव की ओर लौटिए। जय हिंद।