बातें हैं बातों का क्या... जब तक अमल न हो
Naresh Kumar
Aug 12, 2026
अहंकार, ईर्ष्या, लोभ, क्रोध और नफरत से बचने की सीख हम सब जानते हैं, लेकिन असली बदलाव तभी आएगा, जब इन बातों को जीवन में उतारेंगे।

बातें हैं बातों का क्या जब तक...
अहंकार जीवन में सबसे घातक है और किसी एक के लिए नहीं बल्कि हर किसी के लिए..रावण, कंस और हिरणाकश्यप इसके उदाहरण हैं। बावजूद इसके हम अक्सर या कभी न कभी, किसी न किसी रूप में, कहीं भी अहंकार कर ही बैठते हैं और तो और सूक्ष्म अहंकार तो किसी का पीछा छोड़ता ही नहीं? पर हम करते हैं,
यह पता होते हुए भी कि यह नुकसान हमारा ही करेगा? परनिंदा किसी की भी भली नहीं है, परनिंदा से अपना ही नुकसान होता है। हम यह भी जानते हैं कि परनिंदा करने से जिसकी निंदा हम कर रहे होते हैं, उसके पापों का भार हमारे ऊपर आ जाता है।
यह अच्छे से जानते हुए भी हम परनिंदा करने से परहेज नहीं करते? गजब देखिए कि हम सबको पता है कि मौत लाजिमी है और आनी ही है। सच यह भी है कि मौत का दिन निश्चित भी है पर हम में से किसी को नहीं पता पर निश्चित है, बावजूद इसके फिर भी हम धरती पर ऐसे रहते हैं जैसे कि हम ही खुदा हों और हम तो जैसे रजिस्ट्री करवाकर ही आए हों?
ईर्ष्या एक ऐसा रोग है जो यदि किसी को भी लग जाए तो वह उसी को खा जाता है लेकिन बावजूद इसके लगभग-लगभग हर कोई एक दूसरे से ईर्ष्या करता दिखाई देता है? ऐसे ही कई बातें हैं जैसे कि लोभ-लालच, क्रोध, मोह आदि-आदि, जिनसे बचने की सलाह हमें हमारे पूर्वजों ने दी और यकीनन सही सलाह है
लेकिन बावजूद इसके लोभ-लालच, क्रोध और मोह से हम छुटकारा नहीं पा रहे हैं, और यह तो तब है कि हम सब कुछ जानते हैं पर फिर भी यह करते हैं? सामान सौ बरस का और पल की खबर नहीं...यह किसी गजल के अशआर का हिस्सा है पर कड़वा सच है
लेकिन उससे भी कड़वा सच यह है कि हम कितनी ही बार इसे पढ़, सुन और कह चुके हैं लेकिन व्यवहार में वही ढाक के तीन पात मिलते हैं? हैरत तो इस बात की है कि प्यार धरती का मूल है और यह बात हम सब जानते भी हैं लेकिन कारोबार हम नफरत का कर रहे हैं और खरीदना हम सब प्यार ही चाहते हैं। गजब है भाई बेच सब नफरत रहे हैं और खरीदना सब प्यार चाह रहे हैं
जबकि हमें यह भी पता है कि जो बाजार में उपलब्ध होगा, वही तो हम खरीद पाएंगे और मार्किट में उपलब्ध है ही नहीं, उसे कैसे खरीदा जा सकता है? हम सबको पता है और हमारे धर्मग्रन्थ बोल रहे हैं कि परहित सरिस धर्म नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधिमाई लेकिन बावजूद इसके धर्म को हमने धंधे का साधन बना लिया और धर्म के नाम पर कट्टरता को इस कदर अपने भीतर हावी कर लिया कि पूरी की पूरी इंसानियत गायब हो गई और हम फिर भी बात करते हैं धार्मिक होने की और धर्म के अलम्बरदार होने की, ऐसे कैसे हो रहा है?
चिंता से कोई भी मसला आज तक तो हल नहीं हुआ है। इतिहास इस बात का गवाह है और हम खुद भी इस बात को बेहतर जानते हैं, विद्वानों ने भी कुछ-कुछ ऐसा ही कहा है लेकिन दुर्भाग्य कि हम हर हाल में हर मसले पर चिंता ही करते दिखाई देते हैं
जबकि चिंतन से कुछ हल निकल सकता है, वही करने से बचते हैं लेकिन दुर्भाग्य से चिंतन करना हमें नहीं भाता जबकि सब कुछ अच्छे से जानते और समझते हुए भी चिंता नहीं छोड़ते बल्कि उसे और कसकर पकड़ लेते हैं?
आज तक कभी भी किसी दूसरे की लाइन को छोटा करके कोई भी व्यक्ति अपनी लाइन बड़ी नहीं कर पाया। हाँ, यह काम सिर्फ ब्लैकबोर्ड पर तो हो सकता है, लेकिन असल जिंदगी में तो केवल एक ही तरीका है कि हम दूसरे की लाइन को छोटा तभी कर सकते हैं जब हम अपने कार्यों से एक बड़ी लाइन खींच देते हैं पर कितना हैरतपूर्ण है कि लगभग हम सब खुद को बड़ा साबित करने के लिए दूसरे की लाइन को मिटाने का काम करते हैं
जो कि हमें नीचे ही गिराता है पर फिर भी जानते-समझते हुए हम करते यही हैं? यही हाल जाति के दम्भ का है जबकि हम सब वैज्ञानिक रुप से यह जानते हैं कि हम सब एक है और जातियाँ ईश्वर ने तो कभी बनाई ही नहीं, ईश्वर ने केवल और केवल हम सबको इंसान ही बनाया है लेकिन हम जातियों के खांचे में ऐसे बंटे कि इससे बाहर ही नहीं निकलना चाहते जबकि सत्य से अच्छे से वाकिफ हैं।
मतलब साफ हुआ कि ये सब बातें हैं, बातों का क्या.. ...जब तक इन बातों को अमल में न लाया जा सके तब तक सिर्फ बातें ही रहेंगी और जैसे ही ये बातें अमल में आ जाएंगी तैसे ही ये बातें न होकर हमारे लिए वरदान साबित हो जाएंगी।