दो जंतर-मंतर ने सत्ता, राजनीति और मीडिया की असली तस्वीर सामने रख दी। मुद्दा किसी एक पार्टी या नेता का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था का है। शिक्षा, परीक्षा, भर्ती और रोजगार व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव जरूरी है। सवाल युवाओं के भविष्य का है—अब भी नहीं चेते तो बड़ी भूल होगी।
एक कहावत है कि कोर्ट में कोई वाद चल रहा था। कटघरे में कोई अस्सी साल का वृद्ध व्यक्ति खड़ा था। जिससे माननीय जज साहब ने पूछा कि आपकी इतनी उम्र है और आपको छेड़खानी करने में कोई शर्म नहीं आई? इस पर वृद्ध ने जवाब दिया कि जनाब यह केस साठ साल पुराना है और जिस समय यह घटना हुई,उस समय मेरी उम्र मात्र बीस वर्ष की थी।
जज साहब निरुत्तर हो गए। यह बात अक्सर हरियाणा में चुटकले के रूप में कही जाती है और लोग सुनकर मजा लेते हैं पर यह बात बहुत कुछ कहती भी है और व्यवस्था की पोल खोलती है। और यही बात लगभग-लगभग जेन-जी के आंदोलन से जो सवाल उपजे हैं, उन पर भी खरी है। खैर,देश के दो जंतर-मंतरों ने देश की तमाम राजनैतिक पार्टियों और उनके तमाम नेताओं की पोल खोलकर रख दी और यह सिद्ध कर दिया कि सत्ता का चरित्र एकसमान होता है,बेशक कुर्सी पर कोई भी बैठा हो, बेशक कोई जेपी आंदोलन से निकला हो या फिर अन्ना आंदोलन से निकला हो, जब-जब भी कोई सत्ता में आया है तब-तब उनके सुर बदले हैं, लय-ताल बदली है और वह वही रही है जो सत्ता की हुआ करती है। सत्ता का केवल एक ही चरित्र है कि सत्ता के लिए कुछ भी करेगा और करने से नहीं हिचकेगा? यकीन मानिए यदि हमें और आपको भी सत्ता की कुर्सी पर बैठा दिया जाए तो सम्भवत: वही चरित्र होगा, जो इस समय हम देख रहे हैं, हाँ थोड़ा ऊपर-नीचे जरूर होता है? दिल्ली वाला जंतर-मंतर जब हुआ तब सत्ता में विराजे लोग और उनकी संगी-बेली पूरी तरह से आंदोलन को नजरअंदाज किए हुए थे और लाठी चार्ज हुआ लेकिन दिल्ली के जंतर-मंतर आंदोलन को विपक्ष ने सिर पर उठा रखा था, काफी हो-हल्ला मचा रखा था? अब जब दूसरा जंतर-मंतर जो कि में था, उसमें जो सत्ता पक्ष और उसका सहयोगी था, वो नजरअंदाज किए हुए था और वहाँ भी लाठी चार्ज हुआ लेकिन वहाँ के विपक्ष ने उस आंदोलन को सिर पर उठा रखा था और विपक्ष सत्ता के सहयोगियों से सवाल कर रहा था कि सरकार से समर्थन वापिस लो जबकि दिल्ली के जंतर-मंतर आंदोलन बारे लगभग यही बात विपक्ष सत्ता के सहयोगियों से बोल रहा था कि समर्थन वापिस लो..और यही सब चल रहा था?
खैर, यह तो बात हुई राजनीति की, तमाम राजनेताओं की और तमाम राजनैतिक पार्टियों की..जो कि इस देश का कड़वा सच है कि ये सब लोग जनता के लिए नहीं खपते बल्कि सत्ता को कब्जाने के लिए हर काम करते हैं? दूसरी तरफ इन दोनों जंतर-मंतरों ने गोदी मीडिया को तो नेताओं से भी अधिक नंगा कर दिया क्योंकि जहां दिल्ली के जंतर-मंतर के आंदोलन से मेनस्ट्रीम गोदी मीडिया पूरी तरह न केवल आँखे बंद किए हुए था बल्कि कुछ और ही प्रचार कर रहा था और रांची वाले जंतर-मंतर के बारे में पहले दिन से ही ऐसी कवरेज थी कि जैसे मानो पहाड़ ही टूट गया हो। खैर, जबकि सत्य यह है कि दोनों ही आंदोलन जायज थे, दोनों ही आंदोलन एक बड़ा सवाल उठा रहे थे, दोनों ही आंदोलनों को तमाम नेताओं और पार्टियों द्वारा नजरअंदाज अपने-अपने तरीके से किया गया मगर इनका जायज माना जा सकता है क्योंकि इनको तो सत्ता हथियानी है, राज करना है, वैसे भी राजनीति में सब कुछ जायज माना जाता है लेकिन गोदी मीडिया के रवैये को कैसे सही माना जा सकता है क्योंकि मीडिया में हर चीज जायज नहीं मानी जा सकती? दोनों ही आंदोलनों पर हुआ लाठीचार्ज गलत था। खैर, जो मूल सवाल दोनों ही आंदोलनों से निकल कर आया है, उसे हम सब नजरअंदाज कर रहे हैं और वह सवाल यह है कि शिक्षा-परीक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन चाहिए और उसके बाद भर्ती प्रणाली भाई-भतीजावाद से न केवल मुक्त हो बल्कि सिफारिश, रिश्वत से मुक्त होते हुए नियमबद्ध तय समय-सीमा में पूरी की जाने व्यवस्था की जाए और रोजगार का प्रबंध किया जाए, रोजगार देंगे और उसके नाम पर सलाह देना,जेन-जी स्वीकार नहीं करता जबकि सारा मामला या तो कड़ा कानून बनाने पर जोर देकर इधर-उधर किया जा रहा है या फिर इस्तीफे लेकर-देकर निपटाया जा रहा है या फिर परीक्षाएं रद्द करके इतिश्री की जा रही है जबकि दोनों आंदोलनों का मूल मकसद ही व्यवस्था में बदलाव को लेकर है और दोनों ही आंदोलन किसी एक पार्टी,एक नेता के खिलाफ नहीं हैं बल्कि पूरे सिस्टम के खिलाफ है। खैर, न केवल राजनेताओं को, पार्टियों को, मीडिया को बल्कि हम सबको समाज के हर तबके को इस तरफ गौर से देखना होगा और सोचना होगा कि क्या समाधान हो सकता है, शिक्षा-परीक्षा और भर्ती व्यवस्था बदलते हुए रोजगार के अवसर कैसे बढ़ाएं जाएं ताकि सब कुछ सही हो सके और यदि हम सब नहीं चेते तो यकीन मानिए हम सब बहुत बड़ी भूल कर रहे होंगे?