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Editorial

‘रोज’ के बहाने रिश्तों और सोच की परतें खोलता व्यंग्य

‘रोज’ के बहाने रिश्तों और सोच की परतें खोलता व्यंग्य
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Naresh Kumar

Sep 28, 2026

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रोज गार्डन के बहाने इंसानी स्वभाव, ईर्ष्या, अहंकार और भेदभाव की सच्चाई दिखाता रोचक व्यंग्य लेख।

रोज गार्डन के बहाने इंसानी स्वभाव, ईर्ष्या, अहंकार और भेदभाव की सच्चाई दिखाता रोचक व्यंग्य लेख।

‘रोज’ के बहाने ‘रोज’ की बात...

देखने वाले बताते हैं कि ‘रोज गार्डन’ में ‘रोज’ की अनेक वैरायटी देखने को मिलती हैं। बताते हैं कि जहाँ ‘रोज गार्डन’ स्थिति है, वह शहर ब्यूटीफुल सिटी के नाम से जाना जाता है। न जाने क्यों मुझे भी 'रोज' देखने का चाव चढ़ा और 'रोजों' की वैरायटी को भी निहारने का क्योंकि 'रेड रोज' के क्या मायने होते हैं,यह तो अपन समझ चुके हैं पर 'रोजों' की वैरायटी होती है, सो देखने को मन बल्लियाँ उछलने लग गया। तो हुआ यों कि अपन भी 'रोज गार्डन' पहुँच ही गए।

वहाँ जाकर और देखकर हम तो हैरत में ही पड़ गए क्योंकि हमें 'रोज गार्डन' में कुछ 'रोज' ऐसे देखने को मिले जो 'रोज' ही खिलते हैं पर किसी साथ वाले 'रोज' का खिलना उन्हें कदापि पसंद नहीं होता जबकि कुछ 'रोज' ऐसे भी देखें कि वो खिले हुए तो नजर आते हैं पर उनमें खुशबू नाम की कोई चीज नहीं होती जबकि कुछ 'रोज' ऐसे देखने में आए कि जो खुद को 'रोजो' को बाप समझते हैं जबकि अभी तक जिन्होंने ना ठीक से खिलना सीखा है और ना ही महकना सीखा है पर ऐसे टाइप के 'रोज' ऐसा समझते हैं कि 'रोज गार्डन' की आबो हवा उन्हीं के दम पर है।

जबकि ऐसे तथाकथित 'रोज' यह भूल जाते हैं कि इसी 'रोज गार्डन' की वजह से उनका वजूद है, वरना तो कभी के मसल दिए जाते। कुछ 'रोज' तो ऐसे भी 'रोज गार्डन' में देखे गए हैं जो उसी गार्डन में खिलकर भी गार्डन की बुराई करने से नहीं चूक रहे थे, पता नहीं क्या कुछ बोले जा रहे थे? कुछ 'रोज' तो रोज ही ऐसा व्यवहार करते देखे पाए गए कि पूरे गार्डन में विशेष प्रकार का 'रोज' किसी भी कीमत पर खिलने न पाए और न ही खुशबू बिखरने पाए, क्योंकि ऐसा सोचने वाले 'रोज' यह भूल जाते हैं कि चमन में हर 'रोज' की खुशबू अपनी होती है

मगर बड़े 'रोजों' की अपनी मर्जी,यह सही है कि जो बड़े 'रोज' हैं, उन्होंने पहले खिलना सीखा था पर इसका मतलब यह कैसे हुआ कि जो 'रोज' आज खिलना सीख रहा हूं, उसे खिलने का कोई हक नहीं है। 'रोज गार्डन' में ऐसे कई 'रोज' कई रोज मिलते रहे जो अपने ही परिवार में खिलते हुए 'रोजों' से सख्त नफरत करते पाए गए। वैसे एक बात बताते चलें कि यह सिर्फ 'रोज' की कहानी नहीं है, इसे केवल 'रोज' से जोड़कर ही न देखा जाए बल्कि ऐसे-ऐसे 'रोज' विभिन्न रूपों में हर जगह खिले-अधखिले दिखाई दे ही जाते हैं।

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