Nabh Chhor
संपादकीय

मौन भी एक शक्ति है, सही समय पर सही शब्द भी

मौन भी एक शक्ति है, सही समय पर सही शब्द भी
N

Naresh Kumar

Aug 01, 2026

6 Views
जीवन में सफलता केवल बोलने से नहीं, बल्कि सही समय पर मौन रहने और सोच-समझकर बोलने से मिलती है। मौन मन को शांत, संयमित और सकारात्मक बनाता है, जबकि संतुलित वाणी रिश्तों को मजबूत करती है। यही आदत तनाव कम करती है, विवाद घटाती है और जीवन में सुख, शांति तथा सम्मान बढ़ाती है।

जीवन में सफलता केवल बोलने से नहीं, बल्कि सही समय पर मौन रहने और सोच-समझकर बोलने से मिलती है। मौन मन को शांत, संयमित और सकारात्मक बनाता है, जबकि संतुलित वाणी रिश्तों को मजबूत करती है। यही आदत तनाव कम करती है, विवाद घटाती है और जीवन में सुख, शांति तथा सम्मान बढ़ाती है।

 

 

मौन भी रहें पर बोलें भी-जरूरी है

अभी जीवन में जिस दिन हमें यह आभास हो जाएगा कि कब मौन रहना है और कब, कितना बोलना है? ठीक उसी दिन जिंदगी संवर जाएगी और हसीन भी लगने लगे जाएगा। साथ ही दुश्मनों की संख्या में कमी आनी शुरू हो जाएगी और दोस्तों की संख्या में वृद्धि हो जाएगी। मौन रहना कठिन कार्य है,

इसीलिए लोग मौन नहीं रह पाते। सुबह से लेकर रात्रि तक कुछ न कुछ बोलते ही रहते हैं। परंतु यह एक साधना है। ऐसी साधना करने वाले को उसका फल भी अवश्य मिलता है। यदि मौन के समय में ईश्वर का चिंतन किया जाए या कुछ और आध्यात्मिक विषयों पर चिंतन किया जाए, संसार की बातें न सोची जाएं तो इससे बहुत से लाभ होते हैं।

जैसे कि मौन रहने से मन शांत रहता है, तनाव कम हो जाता है, क्रोध भी घटता जाता है, अभिमान का नाश होता है, आदि आदि लाभ होते हैं। इसलिए प्रतिदिन अपनी दिनचर्या में कम से कम एक घंटा मौन अवश्य रखें। दो-तीन घंटे रखें, तो और भी अधिक अच्छा है।

मान लीजिए आप सुबह जब भी उठे। तो कम से कम एक घन्टा तक मौन रह सकते हैं, रहिए, कोशिश कीजिए। किसी से कोई बात न करें। आपको टूथपेस्ट ब्रश तौलिया इत्यादि जो भी सामान चाहिए, उसे पहले से रात को ही अपने पास रखें, सुबह किसी से मांगना नहीं पड़े।

किसी से बात नहीं करनी पड़े। इस प्रकार से मौन वाले उस एक या दो घंटे में अपना नहाना धोना दिनचर्या आदि भी करते रहिए। और मौन रहकर आध्यात्मिक चिंतन भी करते रहिए। इससे आपको ऊपर बताए बहुत से लाभ होंगे। यह तो हुई मौन की बात। दूसरी बात बोलने की है। व्यक्ति सुबह से लेकर रात्रि तक बोलता ही रहता है। बिना विचार किए, बिना प्रमाण से परीक्षा किए कुछ भी बोलता रहता है। यह आदत अच्छी नहीं है। इससे बहुत सी हानियां होती हैं।

बहुत सा झूठ बोला जाता है, बहुत सा छल कपट हो जाता है, अनेक बार निंदा चुगली हो जाती है। फिर उससे लड़ाई झगड़े बढ़ जाते हैं। क्रोध भी बढ़ता जाता है। पता नहीं क्या-क्या दोष आ जाते हैं। इसलिए जो भी बोलें, बहुत सोच समझकर ही बोलें। प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से परीक्षा करके ही बोलें। कम से कम बोलें। नापतोल कर बोलें। बस इतना ही बोलें, जितने कि आपका अभिप्राय दूसरा व्यक्ति ठीक-ठीक समझ जाए। अधिक बोलने से भी ऊपर बताए बहुत सारे दोष आएंगे।

सही समय पर सही बात कहना, यह बहुत बड़ी कला है। इसे भी अवश्य ही सीखना चाहिए। अन्यथा आप जीवन भर झूठ छल कपट निंदा चुगली लड़ाई झगड़ा आदि दोषों से नहीं बच पाएंगे और जीवन में सदा अशांत रहेंगे। अत: अपने जीवन को सफल बनाने के लिए शांति आनंद से जीवन जीने के लिए,ये दोनों बातें आवश्यक हैं। मौन रहना भी सीखें और सही समय पर सही बात बोलना भी सीखें। इसलिए आइए! मौन रहना भी एक साधना है। इसे जीवन में अपनाएं।

 

 
 
 

Related Stories

ई-पेपर