Editorial
कर्मरत रहने से किसने रोका है साहब
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Naresh Kumar
Jun 01, 2026
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इसमें कोई शक नहीं कि शायद सदियों से एक वाक्य प्रचलित है कि किस्मत का लिखा मिटाया नहीं जा सकता।तभी तो बाबा तुलसीदास लिखते हैं कि पहले बना प्रारब्ध,पाछे बना शरीर,तुलसी यह बात अचरज है मन न बांधे धीर।
इसमें कोई शक नहीं कि शायद सदियों से एक वाक्य प्रचलित है कि किस्मत का लिखा मिटाया नहीं जा सकता।तभी तो बाबा तुलसीदास लिखते हैं कि पहले बना प्रारब्ध,पाछे बना शरीर,तुलसी यह बात अचरज है मन न बांधे धीर।सही है बात लेकिन मात्र किस्मत को आधार मान कर या किस्मत पर निर्भरता व्यक्ति में व्यर्थ की आशंका भय,निराशा और तनाव ही पैदा करता है।जिसकी वजह से दिमाग में नकारात्मक विचार ही आते हैं जो भीतर की ऊर्जा को और कमजोर ही करते हैं।याद रखिए व्यक्ति अपना भाग्य खुद बनाता है और यह मुमकिन होता है सही दिशा मे परिश्रम और प्रयास करने से।क्योंकि प्रयास करने से किसने रोका है?किस्मत हर किसी को मौका देती है,मौका चूक जाने पर व्यक्ति उस चीज का लाभ नहीं ले पाता।यह ध्यान देने की बात है कि बहुत कोशिश करने के बाद भी जो व्यक्ति सफल नहीं हो पाता इसके लिए उसकी किस्मत दोषी नहीं है।अपितु कुछ न कुछ कमी जरूर है जो वह अपने गुणों का सही उपयोग नहीं कर पा रहा है।किस्मत बहुत कुछ व्यक्ति के व्यवहार व उसके विचारों पर भी निर्भर है जो उसका जीवन बना सकते हैं तो बिगाड़ भी सकते हैं।ऐसे व्यक्ति को अपनी किस्मत को दोष देने के बजाय पुरुषार्थ को महत्व देना होगा।हमारे आज के किए गए कर्म ही कल की दिशा को तय करते हैं।वास्तव में देखा जाय तो बिना मेहनत और प्रयास के कुछ भी सम्भव नही है।संस्कृत की ये पंक्तियां हम सभी ने स्कूल के दिनों में पढ़ी होंगी।ये उक्ति पुरानी जरूर है लेकिन इसका महत्व आज भी उतना ही है,जितना की एक हजार साल पहले था कि:-उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैःन हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः
अर्थात जिस प्रकार सोते हुए शेर के मुख में खुद मृग प्रवेश नही करता,शेर को उसके लिए मेहनत कर के शिकार करना पड़ता है।ठीक इसी तरह कोई भी कार्य कड़ी मेहनत से ही पूरा होता है,सिर्फ सोचने भर से नहीं।संस्कृत की ये पंक्तियां कर्म को किस्मत से अधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं।हम में से बहुत से लोग ऐसे हैं जो भाग्य का रोना रोते रहते हैं और कठिन परिश्रम नहीं करते।किसी काम में सफल होने के लिए जरूरी प्रयास नहीं करते,शायद ऐसे ही व्यक्तियों के लिए ये पंक्तिया लिखी गई हैं।लोग भाग्य और परिश्रम को अलग -अलग मानते हैं।इसीलिए ऐसी कहावत कहते फिरते हैं कि भाग्य में होगा तो सब कुछ मिल जाएगा और भाग्य में नहीं तो कुछ भी नहीं मिलेगा।ऐसे लोग किसी कार्य में परिश्रम करने से ज्यादा भाग्य के बारे में सोचते रहते हैं।उनको लगता है कि जब किस्मत पलटेगी तो उनकी जिंदगी एकाएक पलट जाएगी।लेकिन सच्चाई तो यह है कि ऐसे लोगें का आधा समय तो किस्मत के बारे में सोचने में ही निकल जाता है।जबकि मेहनत करने वाला व्यक्ति लगन के साथ परिश्रम करने से आगे निकल जाता है।इसलिए सारे अंधविश्वास छोड़कर आलस्य का त्याग करें व जिस लक्ष्य को पाना चाहते हैं उसके लिए जी जान से आज से ही जुट जाएं।क्योंकि किस्मत अपनी जगह और हमारी मेहनत और हमारा पुरुषार्थ अपनी जगह,हमें दोनों के बीच में झूलना नहीं है बल्कि दोनों को पुल बनाकर अपनी मंजिल की ओर अग्रसर होना है और यह तभी होगा जब हम यह मान लेंगे कि ठीक है किस्मत की बात पर पुरुषार्थ करने से कोई मनाही तो कहीं नहीं लिखी,कर्म करने की स्वतंत्रता तो सबने कही ही है तो क्यों ना निरंतर कर्मरत रहें और फिर जैसी ईश्वर इच्छा।और एक नजर इधर पर भी कि यदि हम वास्तव में प्यार करना चाहते हैं तो हमें सीखना होगा कि माफ कैसे करना हैं?अभी से हम बीती बातों को भुलाकर सभी को दिल से माफ करना शुरू करें।यह हकीकत है कि कौन,किसके साथ कब तक रहता हैं,यह उसकी जरूरतें तय करती हैं?और फिर से वही बात कि सच हैं मेहनत हमारे हाथ में है पर नतीजा हमेशा हमारे बस में नहीं होता।चाह और तक़दीर के बीच ही ज़िंदगी का खेल चलता हैं।
कृष्ण कुमार निर्माण एक स्वतंत्र लेखक हैं।