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Editorial

तारीफों के शोर में खोता साहित्य, गायब होते पाठक

तारीफों के शोर में खोता साहित्य, गायब होते पाठक
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Naresh Kumar

Jul 16, 2026

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आज का साहित्यिक माहौल भले ही आयोजनों और पुस्तकों से भरा दिखाई देता हो, लेकिन पाठकों की लगातार घटती संख्या गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। यह लेख साहित्य में बढ़ती आत्ममुग्धता, गुटबाजी, दिखावे की संस्कृति और शब्दों की गिरती साख पर गंभीर सवाल उठाते हुए पाठक-केंद्रित साहित्य की आवश्यकता पर जोर देता है।

आज का साहित्यिक माहौल भले ही आयोजनों और पुस्तकों से भरा दिखाई देता हो, लेकिन पाठकों की लगातार घटती संख्या गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। यह लेख साहित्य में बढ़ती आत्ममुग्धता, गुटबाजी, दिखावे की संस्कृति और शब्दों की गिरती साख पर गंभीर सवाल उठाते हुए पाठक-केंद्रित साहित्य की आवश्यकता पर जोर देता है।

शब्दों की साख की ओर लौटें...
कृष्ण कुमार निर्माण
हकीकत यही है कि आज का साहित्यिक परिदृश्य बाहर से जितना चमकदार, आयोजनों से भरा और सक्रिय दिखता है, भीतर से उतना ही खोखला और पाठक-विहीन होता जा रहा है।​ आत्ममुग्धता के भंवर में फंसा साहित्यिक परिदृश्य जहां लेखक ही पाठक है और कवि ही श्रोता है क्योंकि पाठकों/श्रोताओं का मानो अकाल पड़ गया हो।​

आज का साहित्यिक परिदृश्य एक अजीब आत्मविरोध से गुजर रहा है। एक तरफ किताबों के प्रकाशन की बाढ़ आई हुई है, सोशल मीडिया पर रोज नई रचनाओं के पोस्टर चमक रहे हैं और लगभग हर सप्ताहांत कहीं न कहीं कोई काव्य गोष्ठी, सम्मान समारोह या साहित्यिक उत्सव सज रहा है। लेकिन इस समूचे कोलाहल के बीच जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक सन्नाटा पसरा मिलता है-

श्रोताओं और पाठकों का सन्नाटा।​ यह आज के दौर की सबसे बड़ी साहित्यिक त्रासदी है कि आज कवि ही कवि को सुन रहा है, लेखक ही लेखक की किताब को उपहार में लेकर पढ़ रहा है। आम पाठक इस पूरे परिदृश्य से गायब हो चुका है। कुछ अपवादों को छोड़कर और इस त्रासदी कि जमीन किसी बाहरी ताकत ने नहीं, बल्कि खुद आज के रचनाकारों, उनकी कार्यप्रणाली और उनकी आत्ममुग्धता ने तैयार की है। जैसे कि गोष्ठियों का गिरोहबाजी तंत्र ​साहित्य सेवा का पैमाना अब साधना नहीं, बल्कि नेटवर्किंग बन चुका है।

अधिकांश काव्य गोष्ठियां और साहित्यिक मंच अब वैचारिक मंथन या कलात्मक विमर्श के केंद्र नहीं रहे, बल्कि वे पारस्परिक प्रशंसा संघ में तब्दील हो चुके हैं। तू मेरी तारीफ कर, मैं तेरी तारीफ करूंगा- आज के बहुसंख्यक साहित्यिक आयोजनों का यही अघोषित मूलमंत्र है। यहां तक यह सब भी मुंह देखकर होता है।

इस गिरोहबाजी ने साहित्य के स्तर को भयानक नुकसान पहुंचाया है। जब मंच पर बैठा हर व्यक्ति एक-दूसरे को महान घोषित करने में जुटा हो, तो वहां आलोचना और आत्म-मंथन की गुंजाइश खत्म हो जाती है। जब खराब और सतही रचनाओं पर भी वाह-वाही की कृत्रिम बौछारें होती हैं, तो गंभीर पाठक का वहां से मोहभंग होना स्वाभाविक है। पाठक/श्रोता मूर्ख नहीं है। वह इस पाखंड को पहचानता है और खुद को इस तमाशे से दूर कर लेता है। मजे की बात यह है कि आजकल एकल काव्य पाठ से खुद बचते हैं क्योंकि दूसरे की कौन सुनना चाहता है। जहां ईर्ष्या प्राथमिक है। ​

इस त्रासदी का एक और स्याह पहलू तब उजागर होता है, जब किसी एक कवि या शायर के एकल काव्य पाठ का आयोजन किया जाता है। ऐसे आयोजनों में अक्सर देखा गया है कि बिरादरी के दूसरे साथी लेखक या कवि शामिल ही नहीं होते।​ यह अनुपस्थिति केवल समय की कमी के कारण नहीं होती, बल्कि इसके पीछे एक गहरी ईर्ष्या और असुरक्षा की भावना काम कर रही होती है। मैं उसे सुनने क्यों जाऊं? क्या वह मुझसे बड़ा है?

यह संकीर्ण सोच आज के रचनाकारों में घर कर चुकी है। जब रचनाकार खुद अपने सहकर्मी के शब्दों का आदर नहीं कर सकता, तो वह किसी साधारण पाठक से यह उम्मीद कैसे कर सकता है कि वह अपना समय और पैसा खर्च करके उसे सुनने आए? आज के दौर में एक और भ्रांति ने जन्म लिया है। जितना बड़ा ताम-झाम, उतना ही बड़ा साहित्यकार और ऐसे लोग बिना सोचे-समझे प्रेरणा की बात करने लग जाते हैं जबकि ऐसे लोग उस वक्त पैदा भी नहीं हुए थे मगर जलन कुछ भी लिखवा सकती है, कर-करवा सकती है। पांच सितारा होटलों या बड़े सभागारों में होने वाले चमक-दमक से भरे आयोजन, बुके,मोमेंटो और शॉल ओढ़ाने की रस्मों को ही साहित्य की असली सेवा मान लिया गया है।​

लेकिन कड़वी हकीकत यह है कि ​कवि या शायर का कद उसके तामझाम, उसके सोशल मीडिया फॉलोअर्स या उसके द्वारा आयोजित भव्य कार्यक्रमों से तय नहीं होता। ​साहित्यकार को उसके शब्द जिंदा रखते हैं। उसकी कविता और उसकी शायरी की उम्र, उसकी सोच का विशाल दायरा, इस बात पर निर्भर करती है कि वह मनुष्य की चेतना को कितना झकझोर पाती है।​ आज शब्द बौने हो गए हैं और उनके पीछे खड़ा ‘स्व’ और उसका विज्ञापन बहुत विराट हो गया है।

आजकल तो गंभीर विमर्शों से पलायन खुद साहित्य ही कर रहा है। स्त्री, दलित और पुरुष विमर्श अब ‘दूर की कौड़ी’ हो गया है।​ साहित्य हमेशा से समाज का आईना और हाशिए की आवाज रहा है। चाहे वह स्त्री विमर्श हो, दलित विमर्श हो या बदलते सामाजिक ताने-बाने में पुरुष के भीतर का द्वंद्व पुरुष विमर्श हो- साहित्यिक विमर्शों ने हमेशा समाज को दिशा दी है। ​परंतु, आज की गोष्ठियां इन गंभीर और वैचारिक विमर्शों से पूरी तरह कट चुकी हैं। यकीनन कुछ लोग हैं आज के दौर में भी जो ऐसा करते हैं पर अधिकतर नहीं हैं, सिर्फ काव्य-गोष्ठियों तक सीमित हैं। इन विषयों पर बात करना या तो ‘जोखिम भरा’ मान लिया गया है या फिर उबाऊ। रचनाकार अब ऐसी रचनाएं लिखने और सुनाने में सुरक्षित महसूस करते हैं जो किसी को असहज न करें, जो सत्ता, समाज या रूढ़ियों से टकराने का जोखिम न लें। जब साहित्य अपने समय के सुलगते सवालों, अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरे और सामाजिक विसंगतियों से आंखें चुराने लगे, तो वह केवल मनोरंजन की वस्तु बनकर रह जाता है। और मनोरंजन के लिए आज के पाठक के पास साहित्य से कहीं ज्यादा सुलभ माध्यम मौजूद हैं। 
प्रकाशक-लेखक और पाठक की टूटती कड़ी

​किताबें रोज छप रही हैं लेकिन उनका वितरण तंत्र ध्वस्त है। सैल्फ-पब्लिशिंग के दौर में कोई भी पैसे देकर अपनी किताब छपवा सकता है। प्रकाशकों को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि किताब में साहित्यिक मूल्य क्या है। उनका व्यवसाय लेखक के पैसे से चल रहा है। नतीजा यह है कि बिना किसी संपादन और साहित्यिक कसौटी के कचरा सामग्री बाजार में बाढ़ की तरह आ रही है। इस भीड़ में जो सचमुच अच्छा लिख रहे हैं, उनकी किताबें भी खो जाती हैं। पाठक जब दो-चार बार खराब किताबें खरीदकर ठगा जाता है, तो वह किताबों से ही दूरी बना लेता है। इस त्रासदी से बाहर निकलने का रास्ता भी कवियों, शायरों और लेखकों के आत्म-मंथन से ही शुरू होगा।

यदि साहित्य को बचाना है, तो रचनाकारों को ​कमरों और गोष्ठियों से बाहर निकलना होगा
। साहित्य को वापस चौपालों, आम लोगों और उनके सुख-दुख से जोड़ना होगा।​ सस्ती वाह-वाही का मोह छोड़ना होगा और अपनी आलोचना सुनने का साहस जुटाना होगा। आत्ममुग्धता के इस गुब्बारे को फोड़ना होगा। ​शब्दों की शुचिता और गहराई वापस लानी होगी। यह समझना होगा कि मंच अस्थायी हैं, केवल शब्द शाश्वत हैं। ​पाठक को केंद्र में रखना होगा। पाठक को केवल एक दर्शक या प्रशंसक समझने के बजाय उसे अपनी वैचारिक यात्रा का सहयात्री बनाना होगा।​ जब तक लेखक खुद केवल लिखने और सुनाने की मशीन बना रहेगा और पढ़ने तथा सुनने की सहिष्णुता खो देगा, तब तक पाठकों का यह अकाल दूर नहीं हो सकता। समय आ गया है कि हम ताम-झाम की साख को छोड़कर शब्दों की साख की ओर लौटें।

 

 

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