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Editorial

हिंदी दिवस पर भाषण बहुत, व्यवहार में हिंदी आज भी पीछे

हिंदी दिवस पर भाषण बहुत, व्यवहार में हिंदी आज भी पीछे
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Naresh Kumar

Sep 14, 2026

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हिंदी के सम्मान का असली अर्थ केवल दिवस मनाना नहीं, बल्कि उसे शिक्षा, कामकाज और दैनिक जीवन में अपनाना भी है।

हिंदी के सम्मान का असली अर्थ केवल दिवस मनाना नहीं, बल्कि उसे शिक्षा, कामकाज और दैनिक जीवन में अपनाना भी है।

 

हिंदी दिवस है।एक वर्ष में दो बार यह दिवस मनाया जाता है यानि कि दस जनवरी को विश्व हिंदी दिवस होता है तो वहीं चौदह सितंबर की हिंदी दिवस होता है।निश्चित रुप से देश के कोने-कोने में अनेकों सरकारी,गैर-सरकारी कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।

हिंदी पखवाड़े मनाए जा चुके होंगें।हिंदी की शान में बड़े-बड़े कसीदे पढ़े जाएंगे।बहुत सारे शोध-पत्र प्रकाशित होंगे।हिंदी का बढ़-चढ़कर गुणगान किया जाएगा।कई जगह तो हिंदी का भाषण भी अंग्रेजी में दिया जाएगा।हिंदी दिवस पर भी अंग्रेजी खाकर,ओढ़कर,पहनकर आएंगे।जो बजट है हिंदी के लिए,उसे साफ कर दिया जाएगा।

हिंदी में ये करें,वो करें,ऐसा करें,वैसा करें का ज्ञान बघारा जाएगा और इस तरह से इतिश्री कर ली जाएगी और फिर तीन तिरेसठ दिन,इसी दिन के इंतजार में हिंदी इंतजार करती रहेगी क्योंकि हिंदी के लिए हमने दो दिन निर्धारित कर रखे हैं ताकि उसे याद कर सकें,उसकी महिमा का गुणगान कर सकें और शुल्क ले-देकर सम्मान बांटें,पुरस्कार दें और खुद को सबसे बड़ा हिंदी हितैषी घोषित कर दें क्योंकि इसमें किसी का क्या जाता है?

कमाल की बात यह है कि हिंदी दिवस पर बड़े-बड़े भाषण देने वाले महानुभावों के खुद के हस्ताक्षर अंग्रेजी में होते हैं।नाम-पट्टिकाएं अंग्रेजी में होती है।निमंत्रण-पत्र तक अंग्रेजी में होते हैं।अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में उनके बच्चे पढ़ते हैं क्योंकि सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल है?फिर रोना यह भी रोयेंगे कि आजकल के बच्चों में,छात्रों में,नई पीढ़ी में संस्कार नहीं हैं।अरे!संस्कार लेने कब दिए आपने?

आपने उन्हें अंग्रेजी दी,अंग्रेजी ने उन्हें अंग्रेजियत दी,अब उसे ओढ़िए,बिछाइये और आंनद लीजिए।ये अलग बात है कि ये सब तथाकथित सम्मान/पुरस्कार प्राप्त हिंदी सेवियों का हिंदी के प्रचार-प्रसार में कितना योगदान है?यह अलग से शोध का विषय हो सकता है और सबकी पोल-पट्टी खोल सकता हैं क्योंकि आज जिस स्थान पर हिंदी को होना चाहिए था,उस स्थान पर हिंदी नहीं पहुँच पाई है या यों कह सकते हैं कि हम हिंदी को वो स्थान नहीं दे पाए, जिसकी वह अधिकारी है।सच में, तमाम दिखावे के कार्यक्रम छोड़कर हम सबको यह सोचना/विचारना होगा कि आखिर हिंदी की इस दुर्दशा के लिए कौन जिम्मेदार है? और जैसे ही हम सोचेंगे/विचारेंगे तो पाएंगे कि हम खुद ही इसके लिए जिम्मेदार हैं।

वो तमाम लोग जो हिंदी का खाते हैं,हिंदी जिनकी पहचान है,हिंदी जिस पर उनका वर्तमान और भविष्य टिका है।वो सब लोग जो हिंदी को लेकर राजनीति करते हैं।तमाम प्रिंट एंड इलेक्ट्रोनिक हिंदी मीडिया वाले,हिंदी फिल्मों वाले,हिंदी के तमाम कवि/साहित्यकार,हिंदी की अकदामियाँ,हिंदी की सरकारी-गैर सरकारी संस्थाएं जो हिंदी के विकास एवं संवर्धन के लिए मोटा माल चाट रही हैं,हिंदी के वो तमाम शिक्षक/शिक्षिकाएं,हिंदी के प्राध्यापक,हिंदी के समर्थक जिम्मेवार हैं

क्योंकि सबको अपनी पड़ी है और हिंदी के लिए कोई कुछ करना नहीं चाहता?बस हिंदी का सहारा लेकर,हिंदी को सीढ़ी बनाकर सफलता की वैतरणी पार करना चाहते हैं।कितना हैरान करने वाला है कि आज हम हिंदी सप्ताह,पखवाड़ा मनाने तक सीमित हो गए क्योंकि सिर्फ दिखावा करना है और हकीकत कुछ नहीं होगी।हरियाणा जैसे प्रदेश में हिंदी कितनी कराह रही है? और उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं है क्योंकि बाकी काम करने में तो पता नहीं कितना समय और शक्ति लगेगी मगर हरियाणा के किसी भी प्राथमिक स्कूलों में हिंदी का शिक्षक नहीं है और मिडिल स्कूलों में भी कहीं-कहीं स्वीकृत मिलेगा, फिर कैसे सीखेंगे बच्चे हिंदी और कैसे होगा हिंदी का विकास और संवर्धन?

सवाल यह है कि हम तमाम कार्यक्रम करते हुए कुछ सारगर्भित कार्यक्रम भी करें और जो हम इस तरह के दिवसों पर बोलते हैं,उसे जीवन का हिस्सा बनाएं ताकि हिंदी उस स्थान और पहुँचें,जिसकी वह अधिकारी है और उस संदर्भ में जितना जल्दी हो सके,हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया जाए।यह समय की मांग है और हिंदी ने अपने आप को इसके लिए पूरी तरह से तैयार भी कर लिया है,तभी तो हिंदी विश्व फलक पर अपनी पहचान बना चुकी है।जरूरत है इसे अब अविलंब राष्ट्रभाषा बनाए जाने की।जय हिंदी-जय हिंदुस्तान।

 

 
 
 

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