काशी के पंचगंगा घाट पर आज भी जीवंत है आकाशदीप की प्राचीन परंपरा
Naresh Kumar
Nov 05, 2026
बनारस के पंचगंगा घाट पर हजारों साल पुरानी है आकाशदीप जलाने की परंपरा

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13 hours ago
बनारस, कार्तिक का महीना है और बनारस के घाटों, विशेष रूप से पंचगंगा घाट पर विशेष रौनक है। जैसे-जैसे सांझ घाटों पर उतर रही है, पूजा की टोकरियां लिए पुरुष और महिलाएं पंचगंगा घाट पर बांस के खंभों के पास एकत्र हो रहे हैं। ये लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में आकाशदीप जलाने के लिए आए हैं।
बनारस अपनी देव दीपावली के लिए पर्यटकों के बीच काफी मशहूर है, लेकिन इस पौराणिक शहर की सदियों पुरानी आकाशदीप परंपरा को भी देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं।
कार्तिक मास की शुरुआत से ही महिलाएं संध्या के समय पंचगंगा घाट पर आती हैं और तिल के तेल वाले दीपकों को बांस की टोकरी में रखती हैं। इसके बाद एक रस्सी के सहारे टोकरी को बांस के शीर्ष की ओर बढ़ाया जाता है। महिलाएं खंभों के पास रंगोली बनाती हैं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं। प्रत्येक खंभे के पास जमीन पर देवी-देवताओं के नाम पर कुछ और दीये भी जलाए जाते हैं।
दीपक जलाने की इस प्रक्रिया में सबसे पहले पतली रस्सियों और पुली की मदद से लटकती टोकरियों को नीचे उतारा जाता है। महिलाएं दीये निकालकर उनमें तेल और नई सूती बत्तियां रखती हैं। दीये को जलाकर टोकरी में रखा जाता है और टोकरी को फिर से बांस के खंभों पर रस्सी की मदद से ऊपर खींच दिया जाता है। आकाश की ओर लटकती टोकरियां और टिमटिमाती दीये की रोशनी एक अलौकिक अनुभूति पैदा करती हैं।
बनारस के घाटों और उससे जुड़ी परंपराओं के जानकार वरिष्ठ स्थानीय पत्रकार शशि कुमार ने बनारस से फोन पर पीटीआई-भाषा को बताया, “बांस की कुल लंबाई के नवम अंश पर पताका होनी चाहिए। इस पर एक तुला लटका कर उसकी कंड़ी में बांस या अक्षक की बनी पिटारी लटकाते हैं। इसे डोरी के सहारे ऊपर या नीचे किया जा सकता है। इसी में तिल के तेल से भरा दीया रख कर जलाया जाता है।”
आकाश-दीप से जुड़े कथानकों में ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध में प्राण त्यागने वाले वीरों की स्मृति में पितामह भीष्म ने कार्तिक मास में दीप जलाकर उनका तर्पण किया था।
इस परंपरा की प्राचीनता और इसके महात्म्य संबंधी सवाल पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में ज्योतिष शास्त्र विभाग के प्रोफेसर विनय पांडे ने ‘भाषा’ को बताया, “पौराणिक ग्रंथों में इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। प्रात:काल में गंगा जी के किनारे गंगा स्नान और संध्या के समय आकाश-दीप का दान किया जाता है। अगर पूरे कार्तिक मास कोई ऐसा नहीं कर सकता तो वह महीने में लगातार किसी भी तीन दिन में गंगा स्नान और आकाश-दीप दान कर सकता है।”
साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि लोग पितरों और देवताओं को समर्पित करते हुए अपने घरों की छत या घर के आंगन में भी दीप दान कर सकते हैं।
पंचगंगा घाट पर ही स्थित बटुक भैरव मंदिर के महंत जितेंद्र मोहनपुरी ने बताया कि आकाश दीप पितरों के मार्ग को प्रकाशमान करते हैं।
उन्होंने बताया कि पुराणों में आकाशदीप के तीन भेद बताए गए हैं। इनमें 20 हाथ की लंबाई वाले बांस पर लगे आकाशदीप को उत्तम, नौ हाथ के बांस वाले को मध्यम व पांच हाथ की लंबाई वाले आकाशदीप को कनिष्ठ या अधम माना गया है।
एक सवाल के जवाब में जितेंद्र मोहन पुरी ने बताया, “आकाश-दीप जलाने की यह परंपरा काशी में कालांतर से चली आ रही है।” उन्होंने बताया कि ऐसा माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन देव उत्सव मनाते हैं और कार्तिक मेले में देवता मृत्यु लोक में आते हैं।
बनारस के पंचगंगा घाट पर ही स्थित श्रीमठ में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने 1780 में आकाशदीप के लिए लाल पत्थर से ‘एक हजारा’ का निर्माण कराया था।
महंत पुरी ने दावा किया कि देश में यह अपनी तरह का अनोखा और एकमात्र हजारा है। इस पर एक हजार दीपों को एक साथ जलाने की व्यवस्था है। आकाशदीप परंपरा की गवाही देता यह हजारा आज भी मठ की सीढ़ियों पर देखा जा सकता है। देव दीपावली के दिन इस पर 1008 दीपक जलाए जाते हैं।
एक महीने तक चलने वाला आकाशदीप जलाने का यह आयोजन कार्तिक पूर्णिमा के दिन संपन्न होता है।