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Editorial

प्रेम की असली पहचान है निस्वार्थ भाव

प्रेम की असली पहचान है निस्वार्थ भाव
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Naresh Kumar

Nov 03, 2026

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सच्चा प्यार पाने में नहीं, बल्कि निस्वार्थ भाव से बाँटने, अपनापन देने और दूसरों की परवाह करने में है।

प्यार मतलब सिर्फ देना होता है

वैसे तो आजकल जिसको प्यार कहा जाता है, दरअसल वह प्यार न होकर कुछ और है क्योंकि प्यार जो होता है, वह सुकून देता है न कि दुख। प्यार अपनापन देता है न कि तोड़ता है। पर हम बात उस प्यार की कर रहे हैं जो जीवन में बेहद जरूरी है। इस प्यार में लेना नहीं होता बल्कि सिर्फ देना होता है।

इसी संदर्भ में एक बार एक व्यक्ति अपने जीवन से बहुत निराश हो गया था। उसे ऐसा लगता था कि वह इतनी बड़ी इस दुनिया में बिल्कुल अकेला है। न तो कोई उसे चाहता है और न ही प्यार करता है। वह किसी का प्यार पाने के काबिल भी नहीं है। यही सोच-सोचकर वह हमेशा दुखी रहा करता था।

वसंत के मौसम में सुगंधित फूलों से सारा वातावरण सुंदर व सुगंधित हो रहा था, परंतु वह व्यक्ति अपने घर में बंद ही रहा। एक दिन पड़ोस में रहने वाली लड़की अचानक उसके घर का द्वार खोलकर अंदर आई। उस व्यक्ति को गुमसुम देखकर उसने पूछा कि आप इतने उदास क्यों हैं?

वह व्यक्ति बोला कि मुझे कोई प्यार नहीं करता। कोई मेरी परवाह नहीं करता। मैं बिल्कुल अकेला हूँ। लड़की ने कहा कि यह तो बहुत दुख की बात है कि कोई आपको प्यार नहीं करता, कोई आपकी परवाह नहीं करता। किन्तु यह तो बताइए कि आप कितने लोगों को प्यार और उनकी परवाह करते हैं?

उस व्यक्ति के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। तब लड़की बोली कि आप बाहर आइए और देखिए कि आपके द्वार पर ही कितना प्यार है। आप प्यार चाहते हैं, तो इन फूलों से लीजिए। ये आपको अटूट स्नेह करेंगे। आप प्यार चाहते हैं तो इस प्रकृति से लीजिए, बस इसका दोहन मत कीजिए।

आपको प्यार चाहिए तो अपने काम से प्यार कीजिए, जो आपको सुकून देगा लेकिन दिखावे का प्यार मत कीजिए। बस बदले में आप भी थोड़ा-सा इनका ख्याल रखना, इन्हें थोड़ा-सा प्यार देना।

लड़की की बातें सुनकर उस व्यक्ति के मन की गांठें खुल गईं। उसे अपनी गलती और सांसारिक नियम का अहसास हो गया। उसे पता चल गया कि बिना कुछ भी दिए, पाने की अपेक्षा रखना मूर्खता है।

हम लोगों की भी यही आदत है। हम चाहते हैं कि सब हमें महत्व दें, सम्मान दें, प्रेम करें। परंतु स्वयं न तो किसी को महत्व देना चाहते हैं, न सम्मान देना और न प्रेम करना।

अधिकाधिक मेल-जोल और सारगर्भित संवाद, प्रसन्नता को बढ़ावा देते हैं जबकि इनका अभाव एकाकीपन व निराशा को जन्म देता है।

तो आइए! क्यों न अपनी ओर से देना शुरू करें और कितनी ही चीजें हमारे आस-पास हैं, उनसे प्रेम करें, निरंतर मेल-जोल जारी रखें ताकि हम प्रेमपूर्ण हो सकें।

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