हर कोई खुद को सही मानता है, फिर गलत कौन?
Naresh Kumar
Nov 02, 2026
बाहर की बजाय भीतर झांके फिर...

जहां भी जाइए, बात कीजिए, तो बात यही होगी कि जमाना पहले जैसा नहीं रहा जी? अब तो जमीन-आसमान का अंतर है। प्यार-प्रेम और भाईचारा तो रहा ही कहाँ है? खैर, जब यह बात चल रही हो तब यही सवाल पलटकर पूछिए कि औरों की छोड़िए, क्या आप पहले जमाने की तरह हैं और प्यार-प्रेम और भाईचारे को पसन्द करते हैं, तो झटाक से जवाब मिलेगा कि हम तो पहले जैसे ही हैं और प्यार-प्रेम भाईचारे की कद्र करते हैं?
तो फिर निश्चित रूप से वे दूसरे लोग होंगे, जिनसे समाज को खतरा है और उन्हीं लोगों में जाकर पूछिए, तो उनके भी यही विचार होंगे, तो फिर सवाल का उत्तर तो नहीं मिला? जबकि चाहिए तो था सवाल का उत्तर...और मिल रहा है सवाल का सवाल...और सवाल भी ऐसा मिल रहा है कि हर कोई बोल रहा है कि वह/वे प्यार-प्रेम और भाईचारे की मिसाल हैं और पहले वाले जमाने के लोगों के जैसे हैं, तो फिर बिगड़ा किस बात है?
गजब है भाई। हर कोई कहता है कि मैं ठीक हूँ फिर गलत कौन है? और जब हर कोई ठीक है और जब कोई गलत है ही नहीं, तो फिर जमाना कैसे बदल गया? और अगर यह बात सच है कि जमाना बदल गया है तो निश्चित रूप से लोग ही बदले होंगे क्योंकि बिना लोगों के जमाने का कोई अस्तित्व ही नहीं है?
तो इस तरह से हर सवाल का उत्तर ढूंढा जा सकता है कि सच यह है कि हम सब लोग अपने-अपने तरीके से बिहेव करते हैं और हर बात को अपनी सोच की स्थिति के अनुसार डिफाइन करते हैं। जैसे कि यदि मैं किसी लड़की से प्यार करता हूँ, तो यह बात मैं खुद ही जस्टिफाई कर दूँगा अपने तरीके से तर्क देकर कि जो मैं कर रहा हूँ, वह ठीक है, निहायत ही उचित है मगर यदि कोई मेरी लड़की से उस तरह का प्यार करेगा तो फिर मेरा दृष्टिकोण दूसरा होगा और अपने ही तरीके से तर्क होंगे?
ठीक ऐसे ही कोई भी उदाहरण ले सकते हैं जैसे कि मुझे या मेरे किसी अपने को सरकारी जॉब मिलती हो और उसके लिए सुविधा-शुल्क देना हो तो मेरा तर्क यह होगा कि यह तो चलता है जी मगर इसी स्थिति को पलट दें और ऐसा ही कोई दूसरा करे तो फिर मेरा तर्क यह होगा कि देखो जी! बिना रिश्वत के नौकरी नहीं मिलती और होशियार बच्चे तो ऐसे ही रह जाते हैं।
तो सवाल का उत्तर मिल गया और वह यह है कि जमाना तभी खराब हुआ, जब हम खराब हुए, हमारी सोच खराब हुई और हमने अपने स्वार्थ के कारण अपने ही तर्क घड़ लिए और उन्हें अंतिम मानना शुरू कर दिया। अत: उत्तर यह हुआ कि हम खराब हैं, हम ही प्यार-प्रेम-भाईचारे में नहीं रहना चाहते, तो फिर दूसरा भी नहीं रहना चाहता।
और बात जहाँ तक इसके हल की है तो बड़ा सामान्य-सा हल यह है कि यदि हम सुधरे तो जग सुधरा। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम बाहर की बजाय भीतर झाँके तो बात बनें और फिर देखें कि पहले जैसा प्यार-प्रेम वाला समाज कैसे बनता है?