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Editorial

कुछ-कुछ बातें और पुरुषार्थ-भाग्य

कुछ-कुछ बातें और पुरुषार्थ-भाग्य
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Naresh Kumar

May 28, 2026

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अक्सर हम इस बीच उलझे रहते हैं कि पुरुषार्थ के सहारे रहें या फिर भाग्य के आसरे जीवनयापन करें।आइए!विचार करते हैं।पुरुषार्थ को इसलिए मानो कि ताकि तुम केवल भाग्य के भरोसे बैठकर अकर्मण्य बनकर जीवन प्रगति का अवसर न खो बैठें और भाग्य को इसलिए मानो ताकि पुरुषार्थ करने के बावजूद भी मनोवांछित फल की प्राप्ति न होने पर भी आप परेशानी से ऊपर उठकर संतोष में जी सकें।
अक्सर हम इस बीच उलझे रहते हैं कि पुरुषार्थ के सहारे रहें या फिर भाग्य के आसरे जीवनयापन करें।आइए!विचार करते हैं।पुरुषार्थ को इसलिए मानो कि ताकि तुम केवल भाग्य के भरोसे बैठकर अकर्मण्य बनकर जीवन प्रगति का अवसर न खो बैठें और भाग्य को इसलिए मानो ताकि पुरुषार्थ करने के बावजूद भी मनोवांछित फल की प्राप्ति न होने पर भी आप परेशानी से ऊपर उठकर संतोष में जी सकें।जो लोग केवल पुरुषार्थ पर विश्वास रखते हैं प्रायः उनमें परिणाम के प्रति असंतोष सा बना रहता है और जो लोग केवल भाग्य पर विश्वास रखते हैं उनके अकर्मण्य होने की सम्भावना भी बनी रहती है।अतः केवल एक को आधार बनाकर जिया गया जीवन अपनी वास्तविकता और सहजता खो बैठता है।सत्य तो यही है कि पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माण करता है और भाग्य पुरुषार्थ के अवसरों को जन्म देता है।जिस प्रकार एक माँ के हाथ में डंडा लेने का उद्देश्य अपनी संतान को पीटना नहीं अपितु उसे थोड़ा सा भय दिखाकर गलत काम करने से रोकना होता है।ठीक इसी प्रकार हमारे शास्त्रों में भी दंड विधान का मतलब किसी को आतंकित करना अथवा भयभीत करना नहीं,थोड़ा सा भय दिखाकर मनुष्यों को अनुचित रास्ते पर चलने से बचा लेना है।शास्त्रों का काम डराना नहीं है,जीवन को अराजकता से बचाना है। शास्त्र पशु बने मनुष्यों के लिए उस चाबुक के समान है जो सही दिशा में जाने को बार-बार प्रेरित करता है।शास्त्रों का उद्देश्य भयभीत करना नहीं अपितु भयमुक्त कर देना है।शास्त्र घर में सजाकर रखने के लिए नहीं होते,जीवन में उतारकर कर्मों को सुन्दर बनाने के लिए होते हैं।अतः शास्त्रों से डरो नहीं बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलो।ताकि आपको समझाने के लिए कोई विरोध रुपी शस्त्र का सहारा ना ले।हकीकत यही है।अब कुछ और बातें भी कर लेते हैं।जैसे कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियां जीवन का हिस्सा कहलाती है परंतु उन परिस्थितियों में मुस्कुराते रहना जीवन जीने की कला कहलाती है।तो जीवन की हर परिस्थिति को मुस्कुराते हुए पार करें।समृद्धि पैसे से ही नहीं आती...बल्कि वास्तविक समृद्धि आपकी आदतें,मूल्य,दृष्टि और अनुशासन से आती है।अभी से हम स्वयं को अपनी आदतों,मूल्यों,दृष्टि और अनुशासन से समृद्ध बनाएं।सारी ज़िंदगी की भागदौड़ का मेहनताना भी क्या खूब मिला?बस चेहरे पे झुर्रियाँ ओर अपनों से दूरियाँ।यकीन मानिए हमारा वज़ूद हमारे कर्मों से हैं,किसी की नज़रों से नहीं।याद रखिए पैसा,रुतबा,शोहरत कुछ भी हमेशा किसी एक के पास नहीं टिकता।आज तुम्हारे पास हैं,कल किसी और के पास होगा।इसलिए घमंड किस बात का?जो टिकता है वो है इंसानियत और कर्म।इसलिए इंसानियत रखें और कर्म सदा संभलकर करें।और अंतिम बात यह है कि दुनिया में सिर्फ पाँच लोग धूप में जलते हैं
बाकी तो सब एक दूसरे से जलते हैं?
 
कृष्ण कुमार निर्माण एक स्वतंत्र लेखक हैं।

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