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रोटी से जैतून तेल तक: कैसे बदल गया भूमध्यसागरीय आहार?
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Naresh Kumar
Aug 13, 2026
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आज का भूमध्यसागरीय आहार सब्जियों, जैतून तेल और मछली के लिए जाना जाता है, लेकिन प्राचीन समय में रोटी और अनाज भोजन का मुख्य आधार थे। दालें, फल, सब्जियां, तेल और मछली क्षेत्र व आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलते थे। जानिए कैसे सदियों में भूमध्यसागरीय आहार की तस्वीर बदल गई।
आज का भूमध्यसागरीय आहार सब्जियों, जैतून तेल और मछली के लिए जाना जाता है, लेकिन प्राचीन समय में रोटी और अनाज भोजन का मुख्य आधार थे। दालें, फल, सब्जियां, तेल और मछली क्षेत्र व आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलते थे। जानिए कैसे सदियों में भूमध्यसागरीय आहार की तस्वीर बदल गई।

रोटी से जैतून तेल तक: कैसे बदल गया भूमध्यसागरीय आहार (कॉन्स्टेंटाइन पैनेगायरेस, यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑस्ट्रेलिया)
सिडनी, रोमन सम्राट जूलियन (332–363 ईसवी) ने रोटी को ऐसा भोजन बताया था, जो ''हमारे बीच सबसे अधिक पौष्टिक माना जाता है।''
रोटी और अनाज से बने दूसरे खाद्य पदार्थ वास्तव में प्राचीन भूमध्यसागरीय लोगों के भोजन का मुख्य हिस्सा थे। इसके साथ दालें, तेल, शराब और मौसम के अनुसार उपलब्ध होने वाले फल-सब्जियां खाए जाते थे।
हालांकि, यह आज प्रचलित 'भूमध्यसागरीय आहार' की उस तस्वीर से काफी अलग था, जिसमें सब्जियां, जैतून का तेल और भुनी हुई मछली प्रमुख माने जाते हैं। जूलियन के रोमन संसार में रोटी भोजन का अनिवार्य हिस्सा थी, लेकिन हर संस्कृति में इसे पसंद नहीं किया जाता था। मांस और दूध पर निर्भर रहने वाले इथियोपिया के लोग रोटी को ऐसा भोजन मानते थे, जिसमें पर्याप्त पोषण नहीं होता।
वे हैरानी से पूछते थे कि भूमध्यसागरीय लोग ''गोबर जैसे इस भोजन'' पर आखिर कैसे जीवित रह सकते हैं। गैलेन ने बताया कि कैसी थी प्राचीन थाली
चिकित्सक गैलेन (129–216 ईसी) ने प्राचीन भूमध्यसागरीय आहार का सबसे विस्तृत विवरण दिया है।अपनी पुस्तक 'खाद्य पदार्थों के गुण' में उन्होंने पहले अनाज और दालों, फिर वनस्पतियों और अंत में मांस, अन्य पशु उत्पादों तथा मछली की चर्चा की है। उनके अनुसार, गेहूं सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला और ''मूल्यवान'' खाद्य पदार्थ था।
रोटी केवल भोजन के साथ खाया जाने वाला सहायक पदार्थ नहीं थी। बहुत से लोगों के भोजन का बड़ा हिस्सा रोटी से ही पूरा होता था। गैलेन ने रोटी की कई किस्मों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, सबसे बढ़िया सफेद रोटी ''सबसे अधिक पौष्टिक'' थी। चोकर वाली रोटी को उन्होंने सबसे नीचे रखा, हालांकि उनका मानना था कि यह आंतों को अधिक प्रभावी ढंग से साफ करती है।
रोटी बनाने की विधि भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी। सबसे अच्छी रोटी वही थी जो ''खूब अच्छी तरह गूंथी गई हो'' तथा जिसे ''मध्यम आंच पर'' सेका गया हो। बहुत तेज आंच पर रोटी सेकने से उसकी ऊपरी परत ''सूखी और मिट्टी के बर्तन जैसी'' हो जाती थी, जबकि बीच का हिस्सा कच्चा रह जाता था।
गेहूं को पीसकर और संसाधित करके खाने का महत्व गैलेन को एक अप्रिय अनुभव से समझ आया। एक बार कुछ मित्रों के साथ ग्रामीण इलाके की यात्रा के दौरान एक गरीब किसान महिला ने उन्हें साबुत अनाज उबालकर परोसा, क्योंकि उसके घर में रोटी खत्म हो गई थी।
गैलेन ने इस अनुभव के बारे में लिखा: ''अगले पूरे दिन खाने नहीं पचने के कारण हमें भूख नहीं लगी। हम कुछ खा नहीं सके, पेट में बहुत गैस बनती रही और सिरदर्द तथा धुंधला दिखाई देने की समस्या रही। यहां तक कि मल त्याग भी नहीं हुआ।'' वही अनाज मिल में पीसने, छानने, गूंथने और पकाने के बाद ही उनके लिए पौष्टिक भोजन बन सका।
भोजन में और क्या शामिल था? प्राचीन भूमध्यसागरीय लोग फल और सब्जियां भी खाते थे। गैलेन ने सलाद पत्ते, पत्तागोभी, प्याज, लौकी जैसी सब्जियों के साथ अंजीर, अंगूर, सेब, नाशपाती और अनार का उल्लेख किया है। लेकिन वह इन्हें अपने आप में पौष्टिक भोजन का आधार नहीं मानते थे।
कई वनस्पतियों को मुख्य रूप से उनके औषधीय गुणों के लिए महत्व दिया जाता था। माना जाता था कि वे आंतों को साफ करने, शरीर के तरल पदार्थों को पतला करने या पेशाब बढ़ाने में मदद करती हैं, जबकि उनसे मिलने वाला पोषण बहुत कम था।
वनस्पतियों से भरपूर भोजन कई बार स्वस्थ जीवनशैली का चुनाव नहीं, बल्कि गरीबी की मजबूरी भी हो सकता था। गैलेन जई को ''मनुष्यों के लिए नहीं, बोझ ढोने वाले पशुओं का भोजन'' कहते हैं। हालांकि, ''भूख की चरम स्थिति'' में लोग इससे रोटी बनाने को मजबूर हो जाते थे।
इसके विपरीत, दालें प्राचीन भूमध्यसागरीय भोजन में हमारी आधुनिक धारणा से कहीं अधिक महत्वपूर्ण थीं। मसूर, चना, ल्यूपिन और विभिन्न प्रकार की फलियां पर्याप्त पोषण देती थीं। गैलेन ने अलेक्जेंड्रिया के एक चिकित्सक का भी उल्लेख किया है, जो चार साल तक मुख्य रूप से दालों पर निर्भर रहा। गैलेन बताते हैं कि चिकित्सक का भोजन सुनने में आज के समय के काफी करीब लगता है लेकिन एक अंतर था- चिकित्सक दालों में मछली से बनी चटनी डालकर खाते थे।
हालांकि, ताजी मछली रोजाना के भोजन का हिस्सा नहीं थी। इसकी उपलब्धता इस बात पर निर्भर करती थी कि लोग कहां रहते थे और उनकी आर्थिक स्थिति कैसी थी, क्योंकि हो सकता है कि मछली महंगी रही हों। रोम के आसपास पकड़ी गई मछलियां संभवित अच्छी नहीं मानी जाती थीं क्योंकि टाइबर नदी में ''शौचालयों, स्नानघरों या रसोईघरों'' से निकलने वाला कचरा बहता था और इससे मछलियों के दूषित होने का खतरा रहता था।
क्या सचमुच कोई एक 'भूमध्यसागरीय आहार' था? यूनानी लेखक एथेनियस का विवरण बताता है कि 'भूमध्यसागरीय आहार' को एक ही तरह के भोजन के रूप में देखना कितना भ्रामक हो सकता है।
एथेनियस ने करीब 200 ईसवी में एक ऐसी लंबी दावत की कल्पना की, जिसमें मेहमान भोजन, शराब और खान-पान की परंपराओं पर चर्चा करते हैं। उनके दिए उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि उस दौर में लोगों की भोजन की आदतें उनके रहने के स्थान और आर्थिक स्थिति के अनुसार काफी अलग-अलग थीं।
उन्होंने अपनी एक पुस्तक की शुरुआत आधुनिक स्पेन के इलाके लुसितानिया के वर्णन से की है। उनके अनुसार, वहां समुद्र आधारित भोजन ''प्रचुरता, उत्कृष्टता और सुंदरता के मामले में हमारे समुद्र आधारित भोजन से कहीं बेहतर'' था।
गेहूं, जौ, शराब, अंजीर और मांस वहां बेहद सस्ते थे। जंगली जानवरों का मांस इतना सस्ता था कि विक्रेता कभी-कभी उसे मुफ्त में दे देते थे। लेकिन दूसरी जगहों पर मछली बेहद महंगी थी। एथेनियस ने एक व्यक्ति द्वारा कही कई बातें दर्ज की है, ''मुझे नहीं लगता कि मैंने कभी इतनी महंगी मछली देखी है। हे 'पोसाइडन', अगर आपको हर दिन उन पर खर्च होने वाली रकम का 10 प्रतिशत भी मिल जाए तो आप सबसे अमीर देवता बन जाएंगे!''
ऐसा नहीं था कि मछली हमेशा सादे तरीके से ही परोसी जाती थी। एथेनियस ने पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के सिसिली के रसोइए मिथेकस की एक विधि भी दर्ज की है, ''सिर काटने के बाद रिबन मछली का अंदरूनी हिस्सा साफ करें, उसे धोकर काटें और ऊपर से चीज और तेल डालें।''
मछली और जैतून का तेल सुनने में आज के भूमध्यसागरीय भोजन जैसा लगता है। लेकिन चीज और तेल की मोटी परत आज स्वस्थ और हल्की आंच पर सेंकी गई मछली की हमारी आधुनिक छवि से बिल्कुल मेल नहीं खाती।
तब की थाली और आज का 'भूमध्यसागरीय आहार' अधिकांश प्राचीन भूमध्यसागरीय लोगों के लिए रोटी के बिना भोजन की कल्पना करना मुश्किल था। उनकी अधिकांश कैलोरी अनाज से आती थी। दालें, तेल, सब्जियां, फल और मछली का सेवन क्षेत्र, मौसम और आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलता रहता था।
इसलिए प्राचीन स्रोत किसी एक 'भूमध्यसागरीय आहार' की तस्वीर पेश नहीं करते। वहां कई तरह के आहार थे—एक उन इलाकों के लिए जहां भोजन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध था, दूसरा उन गरीब लोगों के लिए जो किसी तरह अपना पेट भरने की कोशिश कर रहे थे और तीसरा उन अमीर लोगों के लिए जो महंगे और दुर्लभ व्यंजनों पर बेहिसाब पैसा खर्च कर सकते थे।
यानी आज जिसे हम 'भूमध्यसागरीय आहार' कहते हैं, वह कोई ऐसा प्राचीन भोजन नहीं है जो बिना बदलाव के सदियों से हमारी थाली तक पहुंचा हो। यह प्राचीन भोजन परंपरा की आज के हिसाब से बनाई गई एक तस्वीर है, जिसमें जैतून के तेल, सब्जियों और समुद्री भोजन को खास तवज्जो दी गई है, जबकि उस दौर में बड़ी मात्रा में खाई जाने वाली रोटी और पनीर को लगभग भुला दिया गया है।