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परमाणु दुर्घटना में मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल

परमाणु दुर्घटना में मुआवजे पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल
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Naresh Kumar

Aug 17, 2026

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि परमाणु दुर्घटना की स्थिति में उचित और न्यायपूर्ण मुआवजा देने की प्रक्रिया से अदालतों को अलग रखा गया है या नहीं। साथ ही, ‘शांति’ अधिनियम के तहत नियामक नियुक्तियों में हितों के टकराव पर भी स्पष्टीकरण मांगा।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि परमाणु दुर्घटना की स्थिति में उचित और न्यायपूर्ण मुआवजा देने की प्रक्रिया से अदालतों को अलग रखा गया है या नहीं। साथ ही, ‘शांति’ अधिनियम के तहत नियामक नियुक्तियों में हितों के टकराव पर भी स्पष्टीकरण मांगा।

 
 
क्या परमाणु दुर्घटना मामले में उचित मुआवजा देने की प्रक्रिया से अदालतों को अलग रखा गया है: न्यायालय
 
नयी दिल्ली, उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या परमाणु दुर्घटना की स्थिति में 'शांति' अधिनियम के तहत उचित और न्यायपूर्ण मुआवजा देने की प्रक्रिया से अदालतों को अलग रखा गया है।
 
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह सीमित नोटिस जारी कर रही है और केंद्र से यह भी स्पष्ट करने को कह रही है कि क्या 'शांति' अधिनियम के तहत नियामक इकाई में सदस्यों की नियुक्ति को लेकर हितों का कोई टकराव है।उच्चतम न्यायालय पूर्व नौकरशाह ईएएस शर्मा के नेतृत्व में प्रोफ़ेसरों और वैज्ञानिकों समेत याचिकाकर्ताओं के एक समूह की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। 
 
याचिका में कहा गया है कि 2025 का अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
 
समूह की ओर से पेश हुए वकीलों- प्रशांत भूषण और नेहा राठी ने कहा कि कानून किसी भी दुर्घटना की स्थिति में दायित्व की सीमा तय करता है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि बहुत अधिक आशंकाएँ हैं और भले ही संसद ने संचालकों के दायित्व की सीमा तय कर दी हो, फिर भी यह अदालत को उचित और न्यायपूर्ण मुआवज़ा देने से नहीं रोकती।
 
उन्होंने कहा कि संसद ने परियोजना संबंधी प्रोत्साहन और निवेश लाने के लिए विधेयक पारित किया है।भूषण ने कहा कि यह संचालकों को सुरक्षा के मामले में कोताही बरतने की अनुमति देने जैसा है। पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह परमाणु ऊर्जा आयोग द्वारा गठित खोज और चयन समिति की सिफारिश पर शांति अधिनियम की धारा 17 (4) के तहत परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एईआरबी) के सदस्यों की नियुक्ति पर अपना रुख स्पष्ट करे।
 
भूषण ने कहा कि देश में परमाणु ऊर्जा आयोग की जिम्मेदारी परमाणु ऊर्जा केंद्र चलाने की है और वह नियामक इकाई के लिए सदस्यों की सिफारिश नहीं कर सकता, क्योंकि यह हितों का टकराव है। वर्ष 2010 के परमाणु क्षति नागरिक दायित्व अधिनियम की जगह लेने वाला 'शांति' अधिनियम निजी कंपनियों को नागरिक परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने की अनुमति देता है, लेकिन परमाणु ऊर्जा संयंत्र में किसी दुर्घटना की स्थिति में उन्हें 3,000 करोड़ रुपये से अधिक की देनदारी से छूट देता है।
 
शीर्ष अदालत ने 19 मई को कहा था कि 'भारत के रूपांतरण हेतु परमाणु ऊर्जा के सतत दोहन एवं संवर्धन (शांति) अधिनियम, 2025' के अलग-अलग प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका में उठाए गए मुद्दे ''आर्थिक नीति'' से जुड़े हैं।

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