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मेघालय में 3.40 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि की पहचान, अध्ययन में खुलासा

मेघालय में 3.40 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि की पहचान, अध्ययन में खुलासा
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Naresh Kumar

Oct 19, 2026

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मेघालय में उपग्रह तस्वीरों और GIS तकनीक से 3,40,673 हेक्टेयर ऐसी भूमि चिह्नित की गई है, जहां लंबे समय से खेती नहीं हुई। अध्ययन के अनुसार, खेती के लिए उपयोग से पहले मिट्टी, पानी और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन जरूरी है।

मेघालय में उपग्रह तस्वीरों और GIS तकनीक से 3,40,673 हेक्टेयर ऐसी भूमि चिह्नित की गई है, जहां लंबे समय से खेती नहीं हुई। अध्ययन के अनुसार, खेती के लिए उपयोग से पहले मिट्टी, पानी और आर्थिक व्यवहार्यता का आकलन जरूरी है।

शिलांग। मेघालय में उपग्रह तस्वीरों और भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) तकनीक की मदद से 3,40,673.36 हेक्टेयर ऐसी भूमि की पहचान की गई है, जहां लंबे समय से खेती नहीं की गई है। यह क्षेत्र राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 15.2 प्रतिशत है। एक नए अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस भूमि का आकलन खेती के विस्तार और टिकाऊ भूमि उपयोग की योजना बनाने में मदद कर सकता है।

कम घनी झाड़ियों वाली भूमि का सबसे बड़ा हिस्सा

इस महीने की शुरुआत में Journal of Geography, Environment and Earth Science International में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, चिह्नित भूमि में सबसे बड़ा हिस्सा कम घनी झाड़ियों वाले क्षेत्र का है।

अध्ययन में भूमि को चार श्रेणियों में बांटा गया है। इनमें कम घनी झाड़ियों वाली भूमि, घनी झाड़ियों वाली भूमि, झूम खेती के क्षेत्र और घास के मैदान एवं चारागाह शामिल हैं।

चिह्नित भूमि का वर्गीकरण इस प्रकार है:

  • कम घनी झाड़ियों वाली भूमि: 2,06,595.18 हेक्टेयर यानी 60.64 प्रतिशत।

  • घनी झाड़ियों वाली भूमि: 99,488.89 हेक्टेयर यानी 29.20 प्रतिशत।

  • झूम खेती वाले क्षेत्र: 34,331.34 हेक्टेयर यानी 10.08 प्रतिशत।

  • घास के मैदान और चारागाह: 257.94 हेक्टेयर यानी 0.08 प्रतिशत।

उपग्रह तस्वीरों से किया गया भूमि का आकलन

यह शोध नॉर्थ-ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, तुरा और उमियाम स्थित नॉर्थ ईस्टर्न स्पेस एप्लीकेशंस सेंटर (NESAC) से जुड़े रौनक मीना, चंदन गोस्वामी, सी. पी. सुरेश और अकमौल हक ने किया।

शोधकर्ताओं ने वर्ष 2025-26 में एलआईएसएस-4 सेंसर से प्राप्त बहुवर्णक्रमीय उपग्रह तस्वीरों का इस्तेमाल किया। इन तस्वीरों और GIS तकनीक के माध्यम से भूमि की विभिन्न श्रेणियों की पहचान की गई और उनके क्षेत्रफल का आकलन किया गया।

इस तरह की तकनीक से बड़े भौगोलिक क्षेत्रों में भूमि की स्थिति का अध्ययन करने और भविष्य की योजना बनाने के लिए उपयोगी आंकड़े जुटाए जा सकते हैं।

भूमि को दोबारा खेती योग्य बनाने के लिए प्राथमिकता तय

अध्ययन में भूमि को दोबारा खेती के लिए उपयोगी बनाने की प्राथमिकता के आधार पर अंक भी दिए गए। कम घनी झाड़ियों वाली भूमि को 100 में से 95 अंक मिले, जो सभी श्रेणियों में सबसे अधिक हैं।

वहीं, घनी झाड़ियों वाली भूमि को 80 अंक, झूम खेती वाले क्षेत्रों को 60 अंक और घास के मैदानों एवं चारागाहों को 25 अंक दिए गए।

शोधकर्ताओं के अनुसार, ये आकलन कृषि विकास, संसाधनों के प्रबंधन और भूमि उपयोग की योजना तैयार करने में मददगार हो सकते हैं। इससे उन क्षेत्रों की पहचान करने में सहायता मिल सकती है, जिनका विस्तृत अध्ययन कर भविष्य में खेती के लिए उपयोग की संभावनाएं तलाश की जा सकती हैं।

पूरी भूमि को तुरंत खेती योग्य नहीं माना जा सकता

अध्ययन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नक्शे में चिह्नित पूरी भूमि को तत्काल खेती के लिए उपयुक्त नहीं माना जा सकता। भूमि को कृषि के लिए तैयार करने से पहले कई महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच जरूरी होगी।

इनमें मिट्टी की गुणवत्ता, भूमि की ढलान, पानी की उपलब्धता, क्षेत्र तक पहुंच और आर्थिक व्यवहार्यता शामिल हैं। अध्ययन में इन सभी पहलुओं का विस्तृत आकलन नहीं किया गया है।

कृषि विकास की योजना बनाने में मिल सकती है मदद

शोधकर्ताओं का मानना है कि अध्ययन के निष्कर्ष मेघालय में भूमि उपयोग की बेहतर योजना बनाने और कृषि संसाधनों के प्रबंधन के लिए आधार प्रदान कर सकते हैं। हालांकि, किसी भी क्षेत्र को खेती के लिए विकसित करने से पहले स्थानीय परिस्थितियों और पर्यावरणीय प्रभावों का विस्तृत मूल्यांकन करना आवश्यक होगा।

इस अध्ययन ने संभावित कृषि भूमि की पहचान की है, लेकिन उस भूमि पर खेती शुरू करने की उपयुक्तता का निर्णय आगे के आकलन के बाद ही किया जा सकेगा।

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