किसी की मौत का वीडियो वायरल करना क्यों हो सकता है खतरनाक?
Naresh Kumar
Oct 13, 2026
मौत के भयावह वीडियो देखना और शेयर करना कितना सही? विशेषज्ञ ने उठाए गंभीर सवाल

पर्थ। सोशल मीडिया और डिजिटल तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के बीच हिंसक घटनाओं, जानलेवा हमलों और मौत के भयावह दृश्यों को देखना और साझा करना पहले से कहीं आसान हो गया है। हाल में सामने आई दो चर्चित घटनाओं ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या किसी व्यक्ति की मौत का वीडियो देखना या उसे सोशल मीडिया पर शेयर करना नैतिक रूप से उचित है?
ब्रिटेन के यॉर्कशायर स्थित एक वन्यजीव उद्यान में बाघ ने बाड़े में घुसे एक व्यक्ति को मार डाला। इस घटना के वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किए गए। वहीं, अमेरिका में 2009 में 13 निहत्थे सैनिकों की हत्या के दोषी निदाल हसन को दी जाने वाली मौत की सजा के सीधे प्रसारण की योजना ने भी विवाद खड़ा कर दिया है।
इन घटनाओं ने मानवीय गरिमा, निजता, मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी से जुड़े गंभीर सवालों को सामने ला दिया है।
बाघ के हमले का वीडियो वायरल, पुलिस ने की शेयर न करने की अपील
ब्रिटेन में बाघ के हमले से हुई व्यक्ति की मौत के बाद पुलिस ने लोगों से घटना का वीडियो ऑनलाइन साझा नहीं करने की अपील की थी। इसके बावजूद वीडियो कुछ समाचार वेबसाइटों और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित होता रहा।
इसी तरह नेपाल में आई बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के वीडियो भी अक्सर सामने आते हैं, जिनमें लोग बेहद खतरनाक परिस्थितियों में दिखाई देते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी घटनाओं की जानकारी देना और किसी व्यक्ति की मौत के भयावह क्षणों को सार्वजनिक करना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए सवाल केवल मीडिया और तकनीकी कंपनियों की जिम्मेदारी का नहीं, बल्कि आम सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के व्यवहार का भी है।
मौत की सजा के लाइव प्रसारण पर मानवाधिकार संगठनों की आपत्ति
अमेरिका में निदाल हसन को दी जाने वाली मौत की सजा का सीधा प्रसारण करने की प्रस्तावित योजना पर भी सवाल उठाए गए हैं।
अमेरिकी युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने इस योजना के समर्थन में कहा कि लोगों को समझना चाहिए कि ऐसे अपराधों के गंभीर परिणाम होते हैं।
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मौत की सजा का सीधा प्रसारण सार्वजनिक रूप से मृत्युदंड देने के समान होगा और यह यातना पर पूर्ण प्रतिबंध के सिद्धांत का उल्लंघन कर सकता है।
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल की क्यिनजॉम धोंगद्यू ने भी कहा कि मृत्युदंड को सार्वजनिक तमाशा बना देना सजा की क्रूरता को और बढ़ाता है।
हिंसक वीडियो देखने से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों के अनुसार, हिंसक और भयावह दृश्य देखने के नकारात्मक मानसिक प्रभावों के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं।
सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो की निगरानी करने और उन्हें हटाने का काम करने वाले कर्मचारियों में पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) जैसी समस्याएं अधिक देखी गई हैं।
वहीं, बच्चों पर हिंसक ऑनलाइन सामग्री का असर विशेष रूप से चिंताजनक हो सकता है। ऐसे दृश्य उन्हें भावनात्मक रूप से परेशान कर सकते हैं और कुछ मामलों में आक्रामक व्यवहार को भी बढ़ावा दे सकते हैं।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि लगातार हिंसक मौतों को तमाशे की तरह देखने से लोगों में करुणा और संवेदनशीलता कमजोर पड़ सकती है।
किसी की मौत को तमाशा बनाना मानवीय गरिमा का उल्लंघन?
किसी व्यक्ति की मृत्यु के भयावह दृश्य सार्वजनिक करना उसकी निजता और मानवीय गरिमा से जुड़ा गंभीर मुद्दा है।
दार्शनिक इमैनुएल कांट के नैतिक विचारों के अनुसार, हर मनुष्य का अपना अंतर्निहित मूल्य और सम्मान होता है। किसी व्यक्ति की पीड़ा या मौत को केवल मनोरंजन अथवा सनसनी फैलाने के उद्देश्य से इस्तेमाल करना उसकी गरिमा के विरुद्ध माना जा सकता है।
इसी तरह दार्शनिक अरस्तू के विचारों में भी करुणा जैसे मानवीय गुणों को बेहतर और सार्थक जीवन के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल सनसनीखेज जिज्ञासा के कारण किसी की मौत का वीडियो देखना भी उस व्यक्ति की निजता और सम्मान के प्रति असंवेदनशीलता दर्शा सकता है।
क्या कभी भयावह दृश्य दिखाना जरूरी भी हो सकता है?
हालांकि, विशेषज्ञ मानते हैं कि कुछ विशेष परिस्थितियों में हिंसक या दुखद घटनाओं के दृश्य दिखाने के पक्ष में भी तर्क हो सकते हैं।
पहला तर्क यह है कि ऐसी घटनाओं को सार्वजनिक करने से समाज ऐतिहासिक अत्याचारों और मानवीय त्रासदियों का साक्षी बन सकता है।
उदाहरण के लिए, द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में यातना शिविरों से बचे लोगों की तस्वीरें सामने लाने का उद्देश्य दुनिया को अत्याचारों की वास्तविकता से अवगत कराना भी था।
इसी आधार पर नेपाल में बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दृश्य दिखाने को कुछ परिस्थितियों में उचित माना जा सकता है, क्योंकि वे लोगों को आपदा की गंभीरता समझाने और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचाव के प्रति जागरूक करने में मदद कर सकते हैं।
लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, बाघ के हमले में किसी व्यक्ति की मौत का वीडियो वायरल करना इस तरह के सार्वजनिक हित की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।
सरकारी पारदर्शिता और सार्वजनिक प्रसारण में क्या अंतर है?
हिंसक दृश्यों के प्रसारण के पक्ष में एक तर्क सरकारी कामकाज में पारदर्शिता का भी दिया जाता है।
जब सरकार किसी व्यक्ति को मौत की सजा देती है, तो नागरिकों को उसकी प्रक्रिया के बारे में जानकारी रखने का अधिकार हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मौत की सजा का सीधा प्रसारण जरूरी नहीं है।
ऐसे मामलों में कुछ अधिकृत गवाहों की मौजूदगी पर्याप्त हो सकती है।
एक अन्य तर्क यह दिया जाता है कि मौत की सजा के दृश्य दिखाने से भविष्य में अपराधों को रोका जा सकता है। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार, इस दावे के समर्थन में पर्याप्त ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करने से पहले सोचें
डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंसक और संवेदनशील सामग्री को साझा करने की जिम्मेदारी केवल समाचार संस्थानों या तकनीकी कंपनियों तक सीमित नहीं रह गई है।
आम उपयोगकर्ताओं के छोटे-छोटे फैसले भी किसी पीड़ित व्यक्ति, उसके परिवार और समाज पर बड़ा प्रभाव डाल सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी भयावह वीडियो को देखने या शेयर करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि क्या इससे कोई सार्वजनिक हित पूरा हो रहा है, या केवल सनसनी और जिज्ञासा को बढ़ावा मिल रहा है?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि यदि हमारी अपनी मौत या पीड़ा का वीडियो सार्वजनिक किया जा रहा होता, तो क्या हम उसे इस तरह साझा किए जाने की अनुमति देते?
मानवीय गरिमा, निजता और संवेदनशीलता का सम्मान करना ही डिजिटल दुनिया में जिम्मेदार व्यवहार की बुनियाद है।